
“मैं आपको आज एक ऐसे बच्चे की कहानी सुनाना चाहता हूँ जो मेरी सोच को हमेशा के लिए बदल गया। उसका नाम था — अंशुल।”
“कक्षा 7 का छात्र था। बहुत शांत, थोड़ा अपने में रहने वाला। क्लास में ना ज्यादा सवाल पूछता, ना जवाब देता। पढ़ाई में औसत, और परीक्षा में कभी-कभी काफी कम अंक भी आ जाते थे।”
“पिछली परीक्षा के बाद जब रिपोर्ट कार्ड बाँट रहा था, तो अंशुल की आँखें नीचे झुकी हुई थीं। उसके नंबर कम आए थे। बाकी बच्चे उसे देखकर हँस रहे थे — ‘फिर से फेल हो गया!’”
“मैंने उससे कहा, ‘अंशुल, तुम निराश क्यों हो?’ उसने धीरे से कहा — ‘सर, मैं जितना भी पढ़ता हूँ, नंबर अच्छे नहीं आते। शायद मैं कभी अच्छा नहीं कर सकता।’ उसकी आँखों में खुद पर से विश्वास खत्म होता दिखा।”
“उस दिन के बाद मैंने ध्यान देना शुरू किया — और मैंने कुछ ख़ास नोट किया। हर बार जब ब्लैकबोर्ड पर मैं कुछ समझाता था, अंशुल एक किनारे बैठा चुपचाप कुछ स्केच करता था। एक दिन मैंने उसकी कॉपी देखी — उसमें पूरी कक्षा का दृश्य था, किताबों के चित्र, मेरे पढ़ाने के हावभाव — सब कुछ इतनी सुंदरता से बनाया था कि मैं दंग रह गया।”
“मैंने उससे पूछा, ‘क्या ये तुमने बनाया है?’ वह बोला — ‘हाँ सर, जब मैं पढ़ाई समझ नहीं पाता, तो उसे ऐसे याद करता हूँ।’ उस दिन मुझे अहसास हुआ — यह बच्चा केवल नंबरों से नहीं, कल्पना से सोचता है।”
“मैंने उसकी कला को बढ़ावा दिया। स्कूल की मैगजीन में उसका पेज छपवाया, उसे आर्ट प्रतियोगिता में भेजा। अगले साल, अंशुल को एक प्रतिष्ठित आर्ट स्कूल से स्कॉलरशिप मिली। आज वह एक प्रोफेशनल ग्राफिक डिज़ाइनर है, जो देशभर में काम करता है।”
हर बच्चा नंबरों की दौड़ में नहीं जीता। कुछ बच्चे अपनी कल्पनाओं की उड़ान में होते हैं। हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनकी उड़ान की दिशा पहचानें, न कि उनके पंखों को काटें।
"और यही है — अंक से आगे की सोच।"