झींगुर की आवाज़ से किलकारी तक – एक इंतज़ार का अंत 1 जुलाई

एक अधूरी सुबह, एक अधूरा स्कूल।
सूरज धीरे-धीरे बादलों की ओट से झाँक रहा था। गाँव के किनारे बने उस छोटे से सरकारी स्कूल में न कोई चहल-पहल थी, न बच्चों की किलकारी, न ‘गुड मॉर्निंग सर’ की आवाज़।

गेट पर जंग लगी ज़ंजीर अब भी उसी तरह झूल रही थी, जैसे कई हफ्तों से लटकी हो। चारों तरफ़ एक सन्नाटा था — और उसी सन्नाटे को चीर रही थी झींगुर की आवाज़।

अंदर बैठा था मास्टर रमेश।

सफेद कुर्ता, धुला हुआ लेकिन थोड़ा पुराना। आँखों पर पुराना चश्मा, जिसमें हर दृश्य थोड़ा धुंधला लेकिन दिल से साफ़ दिखता था।

हर रोज़ की तरह, वो अपनी साइकिल से ठीक 8 बजे स्कूल आते थे। स्कूल का दरवाज़ा खोलते, झाड़ू लगवाते, और कभी-कभी गलती से बच्चों के नाम पुकारते —
“अंशु… प्रिया… राहुल…”
लेकिन कोई जवाब नहीं आता।

कभी कोरोना का डर, कभी सरकारी आदेश, कभी बच्चों का पलायन। स्कूल खुला तो था, लेकिन उसमें कोई नहीं था — सिवाय उस झींगुर के जो हर कोने से अपनी मौजूदगी का एहसास दिला रहा था।

“पढ़ाई फिर कब शुरू होगी?”

रमेश बाबू खुद से पूछते, ब्लैकबोर्ड पर ‘A for Apple’ लिखते, फिर उसे मिटा देते।
कभी-कभी पुराने रजिस्टर खोलते, जिनमें बच्चों के नाम और उंगलियों के निशान थे।

उन्होंने एक कोने में पोस्टर भी लगाया था — “शिक्षा ही शक्ति है।”
लेकिन आज वो पोस्टर भी थोड़ा उखड़ गया था, शायद उम्मीद की तरह।

झींगुर की आवाज़ अब तेज़ हो चली थी।
मानो वो भी कह रहा हो,
“हम हैं, सुनो तो सही। कोई तो है इस सन्नाटे में।”

अचानक…

स्कूल के दरवाज़े की किवाड़ धीमे से खुली।
रमेश बाबू चौंके।
दरवाज़े के बाहर एक नन्हा बच्चा खड़ा था — हाथ में स्लेट और आँखों में सवाल।

“सर, आज पढ़ाई होगी?”

रमेश बाबू की आँखें भीग गईं।
उन्होंने मुस्कुरा कर सिर हिलाया,
“हाँ बेटा, आज से फिर शुरू करते हैं।”

और उस दिन,
झींगुर की आवाज़ के साथ-साथ स्कूल में फिर से गूंजने लगी —
“अ से अनार, आ से आम…”
और एक मास्टर की दुनिया फिर से आबाद हो गई।


कभी-कभी, सबसे बड़ी उम्मीद एक झींगुर की आवाज़ से शुरू होती है।

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