
“मैं आपको एक ऐसे छात्र की कहानी सुनाना चाहता हूँ जो मेरे जीवन के सबसे यादगार अनुभवों में से एक है,” शिक्षक ने अपने साथी शिक्षकों की मीटिंग में कहा।
“उसका नाम था अमन — छोटा, तेज़, और बहुत ही शरारती। जब वह पहली बार मेरी क्लास में आया, तो मेरी आँखें ही खुल गईं। हर 5 मिनट में या तो किसी का रबर गायब, किसी की बोतल गिरा दी, या पीछे बैठकर सीट बजा रहा होता। बाकी छात्र उसकी वजह से परेशान हो जाते थे और कई बार शिकायत करते थे — ‘सर, अमन को क्लास से बाहर भेजिए!’”
“एक दिन तो हद हो गई। उसने क्लास की घंटी बजने से पहले ही टिफिन निकालकर सबका ध्यान भटका दिया। सभी बच्चों ने एक सुर में कहा — ‘सर! उसे सज़ा मिलनी चाहिए।’ उस पल मैं गुस्से में था, पर जाने क्यों, मैंने कुछ अलग सोचा।”
“मैंने मुस्कराते हुए उसे बुलाया और कहा — ‘अमन, तुममें बहुत ऊर्जा है। क्यों न हम इस ऊर्जा को सही दिशा दें? आज से तुम क्लास मॉनिटर हो।’”
“पूरा क्लास चौंक गया। कई बच्चों ने कानाफूसी की — ‘सर पागल हो गए हैं शायद।’ पर मैंने अपने फैसले पर भरोसा रखा।”
“अमन को जब ज़िम्मेदारी मिली, तो वह बदला। शुरू में तो थोड़ा खेल-खेल में किया, पर जब उसे महसूस हुआ कि बाकी बच्चे उसकी ओर अब सम्मान से देख रहे हैं, तो उसका व्यवहार भी बदलने लगा। अब वह बोर्ड साफ करता, देर से आने वालों को नोट करता, और खुद सबसे पहले आता।”
“महीनों बाद जब साल खत्म हुआ, तो मैंने उसकी रिपोर्ट कार्ड पर लिखा — ‘तुम एक नेता हो, बस तुम्हें यह यकीन दिलाने वाला चाहिए था।’”
संदेश: दंड से नहीं, दिशा देने से बच्चे बदलते हैं।