देर से आने वाला बच्चा

हर सुबह जब स्कूल की घंटी बजती, तो कक्षा 6 ‘ब’ के सभी बच्चे अपनी-अपनी सीटों पर बैठ जाते थे। लेकिन एक चेहरा रोज़ाना कुछ मिनट देर से दिखाई देता — विपिन का।

विपिन, एक सीधा-सादा लड़का, रोज़ स्कूल की यूनिफॉर्म में धूल लगे जूतों और थोड़े अस्त-व्यस्त बालों के साथ कक्षा में दाख़िल होता। उसकी सीट सबसे पीछे थी, शायद इसलिए क्योंकि बाकियों को उसकी देरी से दिक्कत न हो। जैसे ही वह आता, पूरी क्लास हँसती — “लो, आ गया लेट लतीफ!” कुछ बच्चे तो उसका नाम ही बदलकर “लेट पिन” कहने लगे थे।

शिक्षक मिस्टर शास्त्री को भी शुरू में यह आदत खटकती थी। एक दिन उन्होंने उसे रोक लिया और कड़ी आवाज़ में पूछा, “हर दिन देर से क्यों आते हो विपिन? क्या तुम्हें समय का मूल्य नहीं पता?”

विपिन ने कुछ कहने की कोशिश की, पर उसकी आँखों में डर और चेहरे पर झिझक थी। वह चुपचाप सिर झुकाकर अपनी सीट पर चला गया।

अगले दिन मिस्टर शास्त्री ने तय किया कि इस बार वह विपिन की बात बिना डाँटे सुनेंगे। जैसे ही वह फिर से थोड़ी देरी से आया, उन्होंने नरम स्वर में पूछा, “बेटा, सच-सच बताओ — क्या बात है? क्या कोई परेशानी है?”

विपिन की आँखें भर आईं। उसने कहा, “सर, मेरी माँ बीमार हैं। पापा गाँव में रहते हैं और हम यहाँ अकेले हैं। हर सुबह स्कूल से पहले मैं अस्पताल जाकर माँ के लिए दवाई लेकर आता हूँ। दवाइयों की दुकान जल्दी नहीं खुलती, इसलिए देर हो जाती है।”

उस पल कक्षा में सन्नाटा छा गया। सभी बच्चों की आँखें हैरानी और शर्म से भर गईं। और मिस्टर शास्त्री… उनकी आँखें नम थीं।

उन्होंने आगे बढ़कर विपिन के सिर पर हाथ रखा और कहा, “तुम मेरे लिए सबसे ज़िम्मेदार छात्र हो। अब से कोई तुम्हारा मज़ाक नहीं उड़ाएगा, बल्कि तुम्हारी मदद करेगा।”

उस दिन के बाद विपिन को देरी पर कोई ताना नहीं मिला। कुछ बच्चे तो सुबह उसके साथ दवाई लाने भी जाने लगे। धीरे-धीरे उसकी माँ ठीक हो गईं, और विपिन भी समय पर आने लगा।

संदेश: हर व्यवहार के पीछे एक कहानी होती है — सुनिए, समझिए, और साथ दीजिए।

1 thought on “देर से आने वाला बच्चा”

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top