इस प्रहेलिका में सूर्य के वर्णन को विभिन्न प्रतीकों और उपमाओं के माध्यम से रहस्यपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसमें सूर्य की ज्योति, ताप-नाशक शक्ति, जीवनदायिनी प्रकृति तथा उसके सर्वव्यापी अस्तित्व का संकेत मिलता है। पहेली का उद्देश्य विद्यार्थियों में विचार, विश्लेषण और भाषा-ज्ञान की क्षमता को विकसित करना है।
पाठ : दशमः पाठः — प्रहेलिका (पहेली)
वने वसति को वीरः योऽसि-अस्थि–मांस–विवर्जितः।
(vane vasati ko veerah yo’si-asthi-maans-vivarjitah)
जंगल / संसार में एक ऐसा वीर रहता है, जिसका हड्डी-मांस-तलवार वाला शरीर नहीं है (निर्देही तेजस्वी रूप है)।
असित् कुक्कुरं काकम् काकं कृत्वा वनं गतः॥१॥
(asit kukkuram kaakam kaakam kritvaa vanam gatah)
वह काले कुत्ते और कौए जैसे अन्धकार को हटाकर, सब ओर प्रकाश फैलाते हुए वन की ओर चला जाता है।
न तस्याः न तस्याः मध्ये यः तस्य तिष्ठति।
(na tasyaah na tasyaah madhye yah tasya tishthati)
वह न केवल किसी एक ओर है, न दूसरी ओर; वह सबके बीच में स्थित होकर सबको प्रकाश देता है।
त्वत्समीपस् ममाप्यस्ति यदि जानासि तद् वद॥२॥
(tvat-sameepas mamaapy asti yadi jaanaasi tad vada)
वह तुम्हारे पास भी है, मेरे पास भी; यदि पहचानते हो तो बताओ कि वह कौन है।
एकाक्षिणं काकोलं बिलिंच्छन्नं न पत्रतः।
(ekaakshinam kaakolam bilim chhannam na patratah)
वह एक आँख वाला दिखता है, मानो आकाश रूपी गुफा में स्थित हो; किसी पत्ते पर टिका हुआ नहीं है।
क्षीयते वर्धते चैव न समुद्रे न चन्द्रमाः॥३॥
(kshiyate vardhate chaiva na samudre na chandramaah)
वह कभी कम-ज्यादा होता दिखाई देता है; पर न वह समुद्र है, न चन्द्रमा ही है।
प्रकाशः शीतलः यस्य यः कलाभिः च वर्धते।
(prakaashah sheetalah yasya yah kalaabhih cha vardhate)
जिसका प्रकाश सुहावना और जीवन देने वाला है और अपनी किरणों के साथ फैलता-बढ़ता रहता है।
तापं हन्ति सर्वेषां चकोरस्य प्रियः सः कः॥४॥
(taapam hanti sarveshaam chakorasya priyah sah kah)
जो सबका ताप मिटा देता है और चकोर पक्षी को भी प्रिय है – वह कौन है?
वृक्षाग्रवासी न च पक्षिराजः
(vrikshaagravaasee na cha pakshiraajah)
जो वृक्षों की चोटी पर प्रकाश बनकर रहता है, पर वह पक्षियों का राजा (गरुड़) नहीं है।
त्रिनेत्रधारी न च शूलपाणिः।
(trinetradharee na cha shoolapaaneeh)
जो तीन नेत्रों-सी अनेक किरणों वाला दिखता है, फिर भी भगवान शंकर नहीं है।
त्वक्छद्वहारी न च सिद्धयोगी
(tvakchadvahaaree na cha siddhayogee)
जो किरणों की आभा रूपी आवरण धारण करता है, पर कोई सिद्ध योगी नहीं है।
जलं च विष्णुं न घटो न मेघः॥५॥
(jalam cha vishnum na ghato na meghah)
जिसमें जीवनदायी तेज ऐसा है जैसे अमृत-जल और भगवान विष्णु; पर वह न घड़ा है, न बादल – यही तो सूर्य है।
शब्दार्थ (Vocabulary Table)
| संस्कृत | उच्चारण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| वने | vane | जंगल / वन में |
| वसति | vasati | रहता है |
| वीरः | veerah | बहादुर, शक्तिशाली |
| असि | asi | तलवार |
| अस्थि | asthi | हड्डी |
| मांस | maans | मांस, शरीर का मांस |
| विवर्जितः | vivarjitah | रहित, बिना |
| असित् | asit | काला, अन्धकारमय |
| कुक्कुरः | kukkurah | कुत्ता |
| काकः | kaakah | कौआ |
| गतः | gatah | चला गया |
| मध्ये | madhye | बीच में |
| तिष्ठति | tishthati | स्थित रहता है |
| त्वत्समीपः | tvat-sameepah | तुम्हारे पास |
| एकाक्षिणम् | ekaakshinam | एक आँख वाला |
| बिलम् | bilam | छेद, गुफा जैसा स्थान |
| क्षीयते | kshiyate | कम होता है, घटता है |
| वर्धते | vardhate | बढ़ता है |
| प्रकाशः | prakaashah | रोशनी, प्रकाश |
| शीतलः | sheetalah | शीतल, ठंडा |
| कलाभिः | kalaabhih | कलाओं, किरणों के द्वारा |
| तापं हन्ति | taapam hanti | गरमी / कष्ट दूर करता है |
| चकोरः | chakorah | एक पक्षी (चकोर) |
| वृक्षाग्रवासी | vrikshaagravaasee | वृक्ष की चोटी पर रहने / चमकने वाला |
| त्रिनेत्रधारी | trinetradharee | तीन नेत्र वाला |
| शूलपाणिः | shoolapaaneeh | त्रिशूल धारण करने वाला |
| त्वक्छद्वहारी | tvakchadvahaaree | त्वचा/आवरण ओढ़ने वाला |
| विष्णुं | vishnum | विशेष, सर्वव्यापक (यहाँ दिव्य जल) |
अभ्यासः (Exercises with Solutions)
१. उच्चारणं कृत्वा पुस्तिकायां च लिखत
प्रत्येक शब्द : संस्कृत + उच्चारण + हिन्दी अर्थ
योऽसि
(yo’si)
तुम जो हो / जो है
विवर्जितः
(vivarjitah)
रहित, से रहित
तवाप्यस्ति
(tava api asti)
तुम्हारे पास भी है
ममाप्यस्ति
(mama api asti)
मेरे पास भी है
एकाक्षः
(ekaakshah)
एक आँख वाला
बिलमिच्छन्
(bilam ichchhan)
छेद / गड्ढे में रहने वाला
वृक्षाग्रवासी
(vrikshaagravaasee)
वृक्ष की चोटी पर रहने वाला
त्वक्छद्वहारी
(tvakchadvahaaree)
त्वचा / आवरण ओढ़ने वाला
विष्णुः
(vishnuh)
विशेष, सर्वव्यापक (यहाँ दिव्य जल)
२. पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) कुम्भकारस्य तन्तुः असितवत् काकं करोति।
(kumbhakaarasya tantuh asitavat kaakam karoti)
कुम्हार का डोरा कौए की तरह काला होता है।
(ख) सः नयनम् अस्ति।
(sah nayanam asti)
वह नयन (आँख) है।
(ग) सः चन्द्रमाः अस्ति।
(sah chandramaah asti)
वह चन्द्रमा है।
(घ) वानरः वृक्षाग्रवासी अस्ति परन्तु पक्षिराजः नास्ति।
(vaanarah vrikshaagravaasee asti parantu pakshiraajah naasti)
बन्दर वृक्ष की चोटी पर रहता है, परन्तु वह पक्षिराज नहीं है।
३. मञ्जूषातः समानार्थक-पदानि
मञ्जूषा: नीरम्, जलब्धिः, शशीः, धनः, नेत्रम्।
समुद्रः — जलब्धिः
(samudrah — jalabdhiḥ)
समुद्र — जल का भण्डार / सागर
चन्द्रः — शशीः
(chandrah — shashee)
चन्द्रमा — चन्द्र / शशि
मेघः — नीरम्
(meghah — neeram)
बादल — जल युक्त
जलं — नीरम्
(jalam — neeram)
पानी — जल
चक्षुः — नेत्रम्
(chakshuh — netram)
आंख — नेत्र
४. बिलोपपदानि परस्परं योजयत
इस प्रश्न के लिये आवश्यक पद पाठ-पुस्तक में दिये जाते हैं।
(as prashna ke liye aavashyak pada paath-pustak mein diye jaate hain)
यहाँ केवल संकेत है कि छूटे हुए पदों का आपस में मिलान कर वाक्य पूरे करने हैं।
५. सन्धि-विच्छेदं कुरुत
तस्यान्तः = तस्य + अन्तः
(tasyaantah = tasya + antah)
तस्यान्तः — ‘तस्य’ और ‘अन्तः’ का संयोग है।
चैव = च + एव
(chaiva = cha + eva)
चैव — ‘च’ तथा ‘एव’ से बना है।
वृक्षाग्रवासी = वृक्ष + अग्र + वासी
(vrikshaagravaasee = vriksha + agra + vaasee)
वृक्षाग्रवासी — वृक्ष + अग्र + वासी (जो वृक्ष की चोटी पर रहता है)।
६. पाठात् क्रियापदानि चित्वा लिखत
वसति
(vasati)
रहता है
वर्धते
(vardhate)
बढ़ता है
हन्ति
(hanti)
नष्ट / दूर करता है
क्षीयते
(kshiyate)
घटता है
तिष्ठति
(tishthati)
ठहरता / स्थित रहता है
जानासि
(jaanaasi)
तुम जानते हो
वद
(vada)
कहो, बताओ
इच्छन्
(ichchhan)
चाहते हुए / इच्छा करने वाला
७. वाक्यानि पूरयत
प्रकाशः शीतलः यस्य यः कलाभिः च वर्धते।
(prakaashah sheetalah yasya yah kalaabhih cha vardhate)
जिसका प्रकाश शीतल है और जो अपनी कलाओं / किरणों से बढ़ता है।
वृक्षाग्रवासी न च पक्षिराजः।
(vrikshaagravaasee na cha pakshiraajah)
जो वृक्ष की चोटी पर स्थित होता है, पर वह पक्षियों का राजा नहीं है।
८. प्रहेलिकायाः उत्तराणि
१. कुम्भकारस्य तन्तुः
(kumbhakaarasya tantuh)
कुम्हार का डोरा / रस्सी
२. नयनम्
(nayanam)
आँख
३. सूचिका-तन्तुः
(soochikaa-tantuh)
सुई-धागा
४. चन्द्रः
(chandrah)
चन्द्रमा
५. नारिकेलः
(naarikelah)
नारियल
सीख / Moral
प्रहेलिकायां गूढार्थः निहितः अस्ति, या अस्मान् चिन्तनशीलान् करोति।
(prahelikaayaam goodhaarthah nihitah asti, yaa asmaan chintansheelaan karoti)
इस पहेली में छिपा अर्थ है, जो हमें सोचने-समझने वाला बनाता है।
सूर्यस्य गुणान् ज्ञात्वा वयं तस्य महत्त्वं बोधामः।
(suryasya gunaan jnaatvaa vayam tasya mahattvam bodhaamah)
सूर्य के गुणों को जानकर हम उसके महत्त्व और उपयोगिता को समझते हैं।
प्रहेलिकाः अस्माकं बुद्धिं, भाषा-ज्ञानं च वर्धयन्ति।
(prahelikaah asmaakam buddhim, bhaashaa-jnaanam cha vardhayanti)
ऐसी पहेलियाँ हमारी बुद्धि और भाषा-ज्ञान दोनों को बढ़ाती हैं।