अयं पाठः दया, करुणा, मानवता च उपदेशयति। मनुष्यैः दीनानां रक्षणं कर्तव्यम्। मूढता देशात् दूरा करणीया। धर्मग्रन्थानां उपदेशः जीवनं मार्गदर्शयति। बालकाः स्वीयाः इति भावः पालनीयः। एषः पाठः मानवधर्मस्य महत्वं दर्शयति।
यह पाठ दया, करुणा और मानवता का संदेश देता है। इसमें गरीबों की रक्षा, अज्ञानता को दूर करने और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी गई है।
तृतीयः पाठः — अभिलाषः
दयामय! देव! दीनेषु दयादृष्टिः सदा देया। प्रतिज्ञा दीनरक्षाय दयालो! जाडु नो हेया॥ दयामय देव! दीनेषु दयादृष्टिः सदा देया। प्रतिज्ञा दीनरक्षाय दयालो! जाडु नो हेया॥ हे दयामय देव! दीनों पर सदा करुणा-दृष्टि रखनी चाहिए। हे दयालु! दीनों की रक्षा की प्रतिज्ञा कभी नहीं छोड़नी चाहिए। मनुष्य मानव भूत्वा इदानीं दानवो जातः। तदेषा मूढता देशात् दूरतः द्रुतं नीयताम्॥ मनुष्य मानव भूत्वा इदानीं दानवो जातः। तदेषा मूढता देशात् दूरतः द्रुतं नीयताम्॥ मनुष्य होकर अब मानव दानव बन गया है। इसलिए यह अज्ञानता देश से शीघ्र दूर की जानी चाहिए। तवोपदेशामृतं त्यक्त्वा विपथा हन्त लोकडुम्। तदुद्धाराय देवेश! गीता पुनर्गया॥ तव-उपदेश-अमृतं त्यक्त्वा विपथा हन्त लोकडुम्। तदुद्धाराय देवेश! गीता पुनर्गया॥ तेरे अमृतमय उपदेश को छोड़कर लोग कुमार्ग पर चले गए—हाय! उनके उद्धार के लिए, हे देवेश! गीता फिर से गाई गई। किमर्थं भूतेषु भावानां विनितापार्थकेष्वम्। यदेतत् बालकाः स्वीयाः प्रभो! नो विस्मृतिर्नेयाः॥ किमर्थं भूतेषु भावानां विनिताप-अर्थकेष्वम्। यदेतत् बालकाः स्वीयाः प्रभो! नो विस्मृतिर्नेयाः॥ प्राणियों में भावनाओं को कष्टदायक क्यों बनाया जाए? हे प्रभु! ये बालक हमारे अपने हैं—इन्हें भूलना नहीं चाहिए।शब्दार्थः
| शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| दयादृष्टिः | कृपापूर्ण भाव |
| देया | देना चाहिए |
| जाडु | कदाचित् (कभी) |
| हेया | छोड़ने योग्य |
| जातः | हो गया |
| इदानीं | इस समय |
| मूढता | अज्ञानता |
| द्रुतम् | शीघ्र |
| नेया | ले जानी चाहिए |
| त्यक्त्वा | छोड़कर |
| विपथः | कुमार्ग |
| स्वीयाः | अपने |
| विस्मृतिः | भूल |
अभ्यास — प्रश्न एवं उत्तर (संस्कृत + हिन्दी)
प्रश्न 1
उच्चारणं कृत्वा पुस्तिकायां च लिखत — उच्चारण करके कॉपी में लिखिए — दीनरक्षायाः, त्यक्त्वा, लोकडुम्, पुनर्गया, विनितापार्थकेष्वम्, तदुद्धारायप्रश्न 2 — एकपदेन उत्तरत
(क) दीनेषु का देया? दीनों पर क्या देना चाहिए? उत्तरः — दयादृष्टिः। उत्तर — करुणा-दृष्टि। (ख) कस्याः प्रतिज्ञा न हेया? किसकी प्रतिज्ञा नहीं छोड़नी चाहिए? उत्तरः — दीनरक्षायाः। उत्तर — दीनों की रक्षा की। (ग) मूढता कस्मात् दूरतः नेया? अज्ञानता किससे दूर की जानी चाहिए? उत्तरः — देशात्। उत्तर — देश से। (घ) मानवस्य उद्धाराय का पुनः गीता? मानव के उद्धार के लिए क्या गाया गया? उत्तरः — गीता। उत्तर — गीता।प्रश्न 3 — रिक्तस्थानपूर्ति
(क) दीनरक्षायाः प्रतिज्ञा नो हेया। दीनों की रक्षा की प्रतिज्ञा नहीं छोड़नी चाहिए। (ख) मूढता देशात् दूरतः नेया। अज्ञानता देश से दूर की जानी चाहिए। (ग) उद्धाराय गीता पुनः गेयाः। उद्धार के लिए गीता फिर से गाई गई। (घ) यदेतत् बालकाः स्वीयाः नेयाः। ये बालक अपने हैं, इन्हें नहीं भूलना चाहिए।प्रश्न 4 — प्रश्ननिर्माणम्
मूढता देशात् दूरतः द्रुतं नेया। प्रश्नः — मूढता कुत्र नेया? प्रश्न — अज्ञानता कहाँ से दूर की जानी चाहिए? गीता पुनर्गया। प्रश्नः — का पुनर्गया? प्रश्न — क्या फिर से गाई गई?प्रश्न 5 — समास/विग्रह
तवोपदेशामृतम् = तव + उपदेश + अमृतम् किमर्थम् = किम् + अर्थम् यदेतत् = यत् + एतत् चेतनाः = चेतना + अः पुनर्गया = पुनः + गायाप्रश्न 6 — संस्कृत अनुवाद
मम एषा नम्रा प्रार्थना अस्ति। यह मेरी विनम्र प्रार्थना है। देशात् दारिद्र्यं दूरतः नयामः। देश से गरीबी दूर करें। कल्याणाय शिक्षां ददामः। कल्याण के लिए शिक्षा दें। स्वास्थ्याय प्रदूषणं दूरतः नयामः। स्वास्थ्य के लिए प्रदूषण दूर करें।प्रश्न 7 — आम् / न
(क) दीनेषु दयादृष्टिः देया। — आम् (ख) दीनरक्षायाः प्रतिज्ञा हेया। — न (ग) प्रतिदिनं दानधर्मं कुर्यात्। — आम् (घ) सुन्दर लेखं न लिखेत्। — नपाठ-सार एवं सीख
यह पाठ करुणा, मानवता और दीन-रक्षा का संदेश देता है। अज्ञान और स्वार्थ से समाज पतन की ओर जाता है। शिक्षा, सदुपदेश और करुणा से ही मानव का कल्याण और समाज का उद्धार संभव है।