यह पाठ हमें सिखाता है कि सच्ची सफलता केवल परिश्रम और सहयोग से ही प्राप्त होती है। सैनिक एक भारी काष्ठखण्ड को उठाने में असमर्थ थे और उनका नायक केवल दूर से आदेश दे रहा था। तभी एक घुड़सवार वहाँ आया, जिसने अहंकार छोड़कर स्वयं सैनिकों के साथ श्रम किया। उसके सहयोग से कार्य सरल हो गया और सभी ने उसकी प्रशंसा की। अंत में नायक को अपनी भूल का बोध हुआ और उसने क्षमा माँगी। यह पाठ अहंकार त्याग, नेतृत्व की सही भावना और श्रम के महत्व का संदेश देता है।
अष्टमः पाठः श्रम एव विजयेते
श्रम एव विजयेते
Śrama eva vijayate
परिश्रम ही विजय दिलाता है
अमेरिकादेशे एकस्मिन् स्थाने सैनिकानाम् आवासाय निर्माणकार्य प्रचलत् आसीत्।
Amerikā-deśe ekasmin sthāne sainikānām āvāsāya nirmāṇakāryaṁ pracalat āsīt.
अमेरिका देश में एक स्थान पर सैनिकों के आवास के लिए निर्माण कार्य चल रहा था।
तत्र द्वारनिर्माणे काष्ठस्य गुरुतरः खण्डः नीयते स्म।
Tatra dvāra-nirmāṇe kāṣṭhasya gurutaraḥ khaṇḍaḥ nīyate sma.
वहाँ द्वार निर्माण के लिए लकड़ी का एक बहुत भारी टुकड़ा ले जाया जा रहा था।
काष्ठखण्डं याने आरोपयितुं सैनिकाः बहुक्लेशं न काष्ठखण्डं क्षेप्तुं समर्थाः आसन्।
Kāṣṭha-khaṇḍaṁ yāne āropayituṁ sainikāḥ bahukleśaṁ api kṣep-tuṁ na samarthāḥ āsan.
लकड़ी के टुकड़े को गाड़ी पर चढ़ाने के लिए सैनिक बहुत प्रयास करने पर भी समर्थ नहीं थे।
किन्तु काष्ठम् अभिभारत्वात् अपि च अशम्यं अभवत्।
Kintu kāṣṭham abhibhāratvāt api ca aśamyam abhavat.
किन्तु अत्यधिक भार के कारण वह कार्य असंभव हो गया।
सैनिकानां एकः नायकः अपि आसीत्।
Sainikānām ekaḥ nāyakaḥ api āsīt.
सैनिकों का एक नायक भी था।
यः दूरात् एव अधिककल्पयोग्य तान् प्रेरयति स्म।
Yaḥ dūrāt eva adhikakalpayogya tān prerayati sma.
जो दूर से ही उन्हें आदेश देता रहता था।
अथान्तरे कश्चित् तुरगाधिरूढः तत्र आगतः।
Athāntare kaścit turagādhirūḍhaḥ tatra āgataḥ.
इसी बीच एक घुड़सवार वहाँ आया।
सः भारवहने अशमान् सैनिकान् विलोक्य नायकम् अवदत् –
Saḥ bhāravahane aśamān sainikān vilokya nāyakam avadat.
उसने भार उठाने में असमर्थ सैनिकों को देखकर नायक से कहा—
“किं पश्यति भवान्? यदि एषां सहयोगं भवान् कर्यात्, तदा कार्यं सुकरं स्यात्।”
Kim paśyati bhavān? Yadi eṣāṁ sahayogaṁ bhavān karyāt, tadā kāryaṁ sukaram syāt.
आप क्या देख रहे हैं? यदि आप इनका सहयोग करें तो कार्य सरल हो जाएगा।
नायकः प्रोवाच – “किं न वेत्ति भवान्? अहम् एषाम् अधिकारी अस्मि।”
Nāyakaḥ provāca – Kim na vetti bhavān? Aham eṣām adhikārī asmi.
नायक बोला—क्या तुम नहीं जानते? मैं इनका अधिकारी हूँ।
कथम् एते सह कार्यं कुर्मः? इत्युक्त्वा सः अश्वसादी अश्वात् अवतरत्।
Katham ete saha kāryaṁ kurmaḥ? Ityuktvā saḥ aśvasādī aśvāt avatarat.
यह कहकर वह घुड़सवार घोड़े से उतर गया।
निजं कोटपीठनं च अवतार्य भूमौ न्यस्यत।
Nijaṁ koṭapīṭhanaṁ ca avatārya bhūmau nyasyat.
उसने अपना कोट उतारकर भूमि पर रख दिया।
ततः असौ काष्ठखण्डस्य उत्थाने सैनिकैः साकं बलसमायं अकरोत्।
Tataḥ asau kāṣṭha-khaṇḍasya utthāne sainikaiḥ sākam balasamāyaṁ akarot.
फिर उसने सैनिकों के साथ मिलकर पूरा बल लगाया।
काष्ठखण्डः याने आरोपितः अभवत्।
Kāṣṭha-khaṇḍaḥ yāne āropitaḥ abhavat.
लकड़ी का टुकड़ा गाड़ी पर चढ़ गया।
सर्वे तस्य सहयोगं प्रशशंसुः।
Sarve tasya sahayogaṁ praśaśaṁsuḥ.
सभी ने उसके सहयोग की प्रशंसा की।
स्वसेनापति वार्षिकं अभिजानन् सः नायकः लज्जितो भूत्वा क्षमां याचत।
Svasenāpati vārikṣaṁ abhijānan saḥ nāyakaḥ lajjito bhūtvā kṣamāṁ yācata.
अपनी भूल समझकर नायक लज्जित हुआ और क्षमा माँगी।
शब्दार्थः
| Sanskrit | Pronunciation | Hindi Meaning |
|---|---|---|
| द्वारनिर्माणे | Dvāra-nirmāṇe | द्वार निर्माण में |
| काष्ठम् | Kāṣṭham | लकड़ी |
| गुरुतरः | Gurutaraḥ | अत्यधिक भारी |
| खण्डः | Khaṇḍaḥ | टुकड़ा |
| आरोपयितुं | Āropayitum | चढ़ाने के लिए |
| बहुक्लेशम् | Bahukleśam | बहुत प्रयास |
| अभिभारत्वात् | Abhibhāratvāt | अधिक भार से |
| अशम्यम् | Aśamyam | असंभव |
| दूरतः | Dūrataḥ | दूर से |
| तुरगाधिरूढः | Turagādhirūḍhaḥ | घोड़े पर सवार |
| सहयोगम् | Sahayogam | सहायता |
| सुकरम् | Sukaram | सरल |
| अधिकारी | Adhikārī | अधिकृत व्यक्ति |
| अश्वसादी | Aśvasādī | घुड़सवार |
| अवतरणम् | Avataraṇam | उतरना |
| उत्थाने | Utthāne | उठाने में |
| बलसमायम् | Balasamāyam contains | पूरी शक्ति |
| प्रशशंसुः | Praśaśaṁsuḥ | प्रशंसा की |
| लज्जितः | Lajjitaḥ | लज्जित |
| क्षमाम् | Kṣamām | क्षमा |
अभ्यास – प्रश्नोत्तर (Solved)
1. उदाहरणं कृत्वा पुस्तिकायां च लिखत –
द्वारनिर्माणे काष्ठस्य उत्थाय सम्यग् आरोपयितुम्।
Dvāra-nirmāṇe kāṣṭhasya utthāya samyag āropayitum.
द्वार निर्माण में लकड़ी को उठाकर ठीक प्रकार से चढ़ाने के लिए।
उत्तर:
अभिभारत्वात् आपतेत् आरूढः आगमिष्यति।
Abhibhāratvāt āpatet ārūḍhaḥ āgamiṣyati.
अधिक भार के कारण वह गिर पड़ेगा और फिर चढ़ेगा।
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत –
(क) किमर्थं काष्ठस्य गुरुतरः खण्डः नीयते स्म?
Kimartham kāṣṭhasya gurutaraḥ khaṇḍaḥ nīyate sma?
लकड़ी का भारी टुकड़ा क्यों ले जाया जा रहा था?
उत्तर:
द्वारनिर्माणार्थं काष्ठस्य गुरुतरः खण्डः नीयते स्म।
Dvāra-nirmāṇārtham kāṣṭhasya gurutaraḥ khaṇḍaḥ nīyate sma.
द्वार निर्माण के लिए लकड़ी का भारी टुकड़ा ले जाया जा रहा था।
(ख) सैनिकाः कर्ष बहुवच्ये अपि अशमाः जाताः? Sainikāḥ karṣe bahuvacye api aśamāḥ jātāḥ? सैनिक बहुत होने पर भी असमर्थ क्यों हो गए?
उत्तर:
अभिभारत्वात् सैनिकाः अपि अशमाः जाताः।
Abhibhāratvāt sainikāḥ api aśamāḥ jātāḥ.
अधिक भार के कारण सैनिक भी असमर्थ हो गए।
(ग) कः दूरात् एव अधिककल्पयोग्य तान् प्रेरयति स्म? Kaḥ dūrāt eva adhikakalpayogya tān prerayati sma? दूर से ही सैनिकों को आदेश कौन दे रहा था?
उत्तर:
सैनिकानां नायकः दूरात् एव तान् प्रेरयति स्म।
Sainikānāṁ nāyakaḥ dūrāt eva tān prerayati sma.
सैनिकों का नायक दूर से ही उन्हें आदेश देता था।
(घ) तुरगाधिरूढः पुरुषः सैनिकान् विलोक्यन् नायकं किम् अवदत्? Turagādhirūḍhaḥ puruṣaḥ sainikān vilokyan nāyakam kim avadat? घुड़सवार ने सैनिकों को देखकर नायक से क्या कहा?
उत्तर:
यदि भवान् सहयोगं कर्यात् तदा कार्यं सुकरं स्यात् इति अवदत्।
Yadi bhavān sahayogaṁ karyāt tadā kāryaṁ sukaram syāt iti avadat.
यदि आप सहयोग करें तो कार्य सरल हो जाएगा, ऐसा उसने कहा।
3. अधोलिखितपदानां विभक्तिं वचनं च लिखत –
उत्तर:
अश्वात् – पञ्चमी – एकवचनम्
याने – सप्तमी – एकवचनम्
क्षमाम् – द्वितीया – एकवचनम् क्रमशः अपादान, अधिकरण और कर्म कारक।
याने – सप्तमी – एकवचनम्
क्षमाम् – द्वितीया – एकवचनम् क्रमशः अपादान, अधिकरण और कर्म कारक।
4. अधोलिखितक्रियापदानां लकारं पुरुषं वचनं च लिखत –
उत्तर:
भवन्ति – लट् – प्रथमपुरुषः – बहुवचनम्
आसीत् – लङ् – प्रथमपुरुषः – एकवचनम्
गमिष्यति – लृट् – प्रथमपुरुषः – एकवचनम्
अकरोत् – लङ् – प्रथमपुरुषः – एकवचनम् चारों क्रियाओं के काल, पुरुष और वचन।
भवन्ति – लट् – प्रथमपुरुषः – बहुवचनम्
आसीत् – लङ् – प्रथमपुरुषः – एकवचनम्
गमिष्यति – लृट् – प्रथमपुरुषः – एकवचनम्
अकरोत् – लङ् – प्रथमपुरुषः – एकवचनम् चारों क्रियाओं के काल, पुरुष और वचन।
5. उपसर्गं लिखत –
उत्तर:
प्रोवाच – प्र
अभिजानन् – अभि
विलोक्यन् – वि दिए गए शब्दों के उपसर्ग।
अभिजानन् – अभि
विलोक्यन् – वि दिए गए शब्दों के उपसर्ग।
6. मञ्जूषातः पदानि चित्वा वाक्यानि पूरयत –
उत्तर:
(क) नायकः सैनिकान् प्रेरयति।
(ख) वायुवेगस्य गतिः तीव्रा भवति।
(ग) अश्वसादी अश्वात् अवतरत।
(घ) भूमेः उत्थाय काष्ठखण्डम् आरोपयितुम्। मञ्जूषा के सभी शब्दों का प्रयोग।
(क) नायकः सैनिकान् प्रेरयति।
(ख) वायुवेगस्य गतिः तीव्रा भवति।
(ग) अश्वसादी अश्वात् अवतरत।
(घ) भूमेः उत्थाय काष्ठखण्डम् आरोपयितुम्। मञ्जूषा के सभी शब्दों का प्रयोग।
7. संस्कृतभाषायाम् अनुवादं कुरुत –
उत्तर:
(क) सैनिकानाम् आवासाय निर्माणकार्य प्रचलत् आसीत्। Sainikānām āvāsāya nirmāṇakāryam pracalat āsīt. सैनिकों के आवास के लिए निर्माण कार्य चल रहा था।
(ख) सैनिकानां एकः नायकः अपि आसीत्। Sainikānām ekaḥ nāyakaḥ api āsīt. सैनिकों का एक नायक भी था।
(ग) सः अश्वसादी अश्वात् अवतरत्। Saḥ aśvasādī aśvāt avatarat. वह घुड़सवार घोड़े से उतरा।
(घ) किमपि कार्यं न लघु न महत्। Kimapi kāryaṁ na laghu na mahat. कोई भी कार्य बड़ा या छोटा नहीं होता।
(ङ) अहं खादन् न गच्छामि। Ahaṁ khādan na gacchāmi. मैं खाते हुए नहीं चलता हूँ।
(च) अहं हसन् जलं न पिबामि। Ahaṁ hasan jalaṁ na pibāmi. मैं हँसते हुए पानी नहीं पीता हूँ।
(क) सैनिकानाम् आवासाय निर्माणकार्य प्रचलत् आसीत्। Sainikānām āvāsāya nirmāṇakāryam pracalat āsīt. सैनिकों के आवास के लिए निर्माण कार्य चल रहा था।
(ख) सैनिकानां एकः नायकः अपि आसीत्। Sainikānām ekaḥ nāyakaḥ api āsīt. सैनिकों का एक नायक भी था।
(ग) सः अश्वसादी अश्वात् अवतरत्। Saḥ aśvasādī aśvāt avatarat. वह घुड़सवार घोड़े से उतरा।
(घ) किमपि कार्यं न लघु न महत्। Kimapi kāryaṁ na laghu na mahat. कोई भी कार्य बड़ा या छोटा नहीं होता।
(ङ) अहं खादन् न गच्छामि। Ahaṁ khādan na gacchāmi. मैं खाते हुए नहीं चलता हूँ।
(च) अहं हसन् जलं न पिबामि। Ahaṁ hasan jalaṁ na pibāmi. मैं हँसते हुए पानी नहीं पीता हूँ।