यह पाठ जीवन को सही दिशा देने वाले सुभाषित श्लोकों का संग्रह है। इसमें क्षमा, सत्य, प्रिय वचन और सत्संग का महत्व बताया गया है। श्लोक सिखाते हैं कि क्षमा के बिना न विद्या प्राप्त होती है और न धन, इसलिए धैर्य और संयम आवश्यक हैं। माता-पिता को सभी तीर्थों और देवताओं के समान मानकर उनका आदर करना चाहिए। मधुर वचन से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं, अतः बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए। सत्य और प्रिय वाणी को ही सनातन धर्म कहा गया है। अंत में सत्संग की महिमा बताई गई है, जो बुद्धि की जड़ता दूर करता है, पाप नष्ट करता है और जीवन में सम्मान, कीर्ति व समृद्धि प्रदान करता है।
नवमः पाठः – सुभाषितानि
सुभाषितानि
Subhāṣitāni
सुन्दर और हितकारी वचन
क्षमा: कण्ठश्रेण विद्यामर्थं च चिन्तयेत्।
Kṣamāḥ kaṇṭhaśreṇa vidyāmarthaṁ ca cintayet.
क्षमा को धारण करके विद्या और अर्थ का चिन्तन करना चाहिए।
क्षान्त्यागो कुतो विद्या कुतो धनम्॥1॥
Kṣāntyāgo kuto vidyā kuto dhanam.
जहाँ क्षमा का त्याग है वहाँ न विद्या होती है, न धन।
प्रथमे नास्ति विद्या द्वितीये नास्ति धनम्।
Prathame nāsti vidyā dvitīye nāsti dhanam.
पहले में विद्या नहीं होती, दूसरे में धन नहीं होता।
तृतीये नास्ति पुण्यं चतुर्थे किं करिष्यति॥2॥
Tṛtīye nāsti puṇyaṁ caturthe kiṁ kariṣyati.
तीसरे में पुण्य नहीं होता, चौथा क्या करेगा?
सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयः पिता।
Sarvatīrthamayi mātā sarvadevamayaḥ pitā.
माता सभी तीर्थों के समान है और पिता सभी देवताओं के समान।
मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत्॥3॥
Mātaraṁ pitaraṁ tasmāt sarvayatnena pūjayet.
इसलिए माता-पिता की पूरे प्रयत्न से पूजा करनी चाहिए।
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
Priyavākyapradānena sarve tuṣyanti jantavaḥ.
प्रिय वचन देने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं।
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥4॥
Tasmāt tadeva vaktavyaṁ vacane kā daridratā.
इसलिए वही बोलना चाहिए, बोलने में कैसी दरिद्रता?
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियं।
Satyaṁ brūyāt priyaṁ brūyāt na brūyāt satyamapriyam.
सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए, अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥5॥
Priyaṁ ca nānṛtaṁ brūyāt eṣa dharmaḥ sanātanaḥ.
प्रिय बोलना चाहिए पर असत्य नहीं, यही सनातन धर्म है।
जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं
Jāḍyaṁ dhiyo harati siñcati vāci satyam.
सत्संग बुद्धि की जड़ता दूर करता है और वाणी में सत्य भरता है।
मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
Mānonatiṁ diśati pāpamapākaroti.
वह मान-सम्मान बढ़ाता है और पापों को दूर करता है।
लक्ष्मीं तनोति वितनोति च दिक्षु कीर्तिं
Lakṣmīṁ tanoti vitanoti ca dikṣu kīrtim.
वह लक्ष्मी देता है और दिशाओं में कीर्ति फैलाता है।
सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥6॥
Satsaṅgatiḥ kathaya kiṁ na karoti puṁsām.
बताओ, सत्संग मनुष्यों के लिए क्या नहीं करता?
शब्दार्थः (Vocabulary)
| Sanskrit | Pronunciation | Hindi Meaning |
|---|---|---|
| क्षमा | Kṣamā | धैर्य, सहनशीलता |
| चिन्तयेत् | Cintayet | विचार करना चाहिए |
| नास्ति | Nāsti | नहीं है |
| तुष्यन्ति | Tuṣyanti | प्रसन्न होते हैं |
| वक्तव्यम् | Vaktavyam | बोलना चाहिए |
| अनृतम् | Anṛtam | झूठ |
| जाड्यम् | Jāḍyam | जड़ता |
| धियः | Dhiyaḥ | बुद्धि की |
| पापमपाकरोति | Pāpamapākaroti | पाप दूर करता है |
| तनोति | Tanoti | फैलाता है |
| दिक्षु | Dikṣu | दिशाओं में |
| पुंसाम् | Punsām | मनुष्यों का |
| सत्सङ्गतिः | Satsaṅgatiḥ | सज्जनों का संग |
| दरिद्रता | Daridratā | कंजूसी |
| सर्वयत्नेन | Sarvayatnena | पूरे प्रयास से |
| सनातनः | Sanātanaḥ | शाश्वत |
| मानोन्नतिः | Mānonatiḥ | मान-सम्मान |
| कीर्तिः | Kīrtiḥ | यश |
| लक्ष्मीम् | Lakṣmīm | सम्पत्ति |
| पूजयेत् | Pūjayet | पूजा करनी चाहिए |
| ब्रूयात् | Brūyāt | बोले |
| सत्यं | Satyam | सच |
| प्रियं | Priyam | प्रिय वचन |
| जन्तवः | Jantavaḥ | प्राणी |
| अप्रियम् | Apriyam | अप्रिय |
अभ्यास – प्रश्नोत्तर
2. एकपदेन उत्तरत –
उत्तर:
(क) विद्या Vidyā क्षमा त्यागने से विद्या नहीं मिलती।
(ख) धनम् Dhanam दूसरे में धन नहीं होता।
(ग) माता Mātā माता सर्वतीर्थमयी है।
(घ) प्रियवाक्यप्रदानेन Priyavākyapradānena प्रिय वचन देने से।
(ङ) सत्यमप्रियं Satyamapriyam अप्रिय सत्य।
(क) विद्या Vidyā क्षमा त्यागने से विद्या नहीं मिलती।
(ख) धनम् Dhanam दूसरे में धन नहीं होता।
(ग) माता Mātā माता सर्वतीर्थमयी है।
(घ) प्रियवाक्यप्रदानेन Priyavākyapradānena प्रिय वचन देने से।
(ङ) सत्यमप्रियं Satyamapriyam अप्रिय सत्य।
अभ्यास
3. वाक्यानि पूर्ति कुरुत –
(क) क्षान्त्यागे कुतः ।
Kṣāntyāge kutaḥ ?
क्षमा के त्याग से कहाँ से क्या प्राप्त होगा?
उत्तर:
क्षान्त्यागे कुतः विद्या।
Kṣāntyāge kutaḥ vidyā.
क्षमा के त्याग से विद्या कहाँ मिलेगी?
(ख) तृतीये नास्ति । Tṛtīye nāsti . तीसरे में क्या नहीं होता है?
उत्तर:
तृतीये नास्ति पुण्यम्।
Tṛtīye nāsti puṇyam.
तीसरे में पुण्य नहीं होता।
(ग) सर्वदेवमयः अस्ति। Sarvadevamayaḥ asti. सभी देवताओं के समान कौन है?
उत्तर:
सर्वदेवमयः पिता अस्ति।
Sarvadevamayaḥ pitā asti.
पिता सभी देवताओं के समान हैं।
(घ) प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति। Priyavākyapradānena sarve tuṣyanti. प्रिय वचन देने से कौन प्रसन्न होते हैं?
उत्तर:
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे जन्तवः तुष्यन्ति।
Priyavākyapradānena sarve jantavaḥ tuṣyanti.
प्रिय वचन देने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं।
4. संस्कृतभाषायाम् अनुवादं कुरुत –
(क) माता-पिता की पूजा करनी चाहिए।
Mātā-pitā kī pūjā karnī cāhiye.
माता-पिता का सम्मान करना चाहिए।
उत्तर:
मातरं पितरं च पूजयेत्।
Mātaraṁ pitaraṁ ca pūjayet.
माता और पिता की पूजा करनी चाहिए।
(ख) समय का पालन करो। Samay kā pālan karo. समय का ध्यान रखना चाहिए।
उत्तर:
समयस्य पालनं कुरु।
Samayasya pālanaṁ kuru.
समय का पालन करो।
(ग) बोलने में कैसी दरिद्रता? Bolne meṁ kaisī daridratā? बोलने में कंजूसी क्यों?
उत्तर:
वचने का दरिद्रता?
Vacane kā daridratā?
बोलने में कैसी दरिद्रता?
(घ) प्रिय तथा सत्य बोलना चाहिए। Priya tathā satya bolanā cāhiye. सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिए।
उत्तर:
प्रियं सत्यं च ब्रूयात्।
Priyaṁ satyaṁ ca brūyāt.
प्रिय और सत्य बोलना चाहिए।
(ङ) प्रियवाक्य प्रदान करने से सभी जन्तु तुष्ट होते हैं। Priyavākya pradān karne se sabhī jantu tuṣṭ hote haiṁ. मधुर वचन से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं।
उत्तर:
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे जन्तवः तुष्यन्ति।
Priyavākyapradānena sarve jantavaḥ tuṣyanti.
प्रिय वचन देने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं।
5. आम् / न लिखत –
(क) क्षान्त्यागे धनं न भवति।
Kṣāntyāge dhanaṁ na bhavati.
क्षमा त्यागने से धन नहीं होता।
भावार्थ: जो व्यक्ति क्षमाशील नहीं होता, क्रोधी और अधीर होता है, वह अपने व्यवहार से अवसर और सम्मान खो देता है, इसलिए उसे धन-लाभ भी नहीं होता।
उत्तर:
आम्
Ām
हाँ
(ख) विद्यार्थीजनैः विद्या न अर्जनीया। Vidyārthijanaiḥ vidyā na arjanīyā. विद्यार्थियों को विद्या नहीं प्राप्त करनी चाहिए।
उत्तर:
न
Na
नहीं
(ग) मातरं पितरं च सर्वयत्नेन पूजयेत्। Mātaraṁ pitaraṁ ca sarvayatnena pūjayet. माता-पिता की पूरे प्रयास से पूजा करनी चाहिए।
उत्तर:
आम्
Ām
हाँ
(घ) प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे जन्तवः न तुष्यन्ति। Priyavākyapradānena sarve jantavaḥ na tuṣyanti. प्रिय वचन से प्राणी प्रसन्न नहीं होते।
उत्तर:
न
Na
नहीं
(ङ) सत्सङ्गतिः किमपि पुंसां न करोति। Satsaṅgatiḥ kimapi puṁsāṁ na karoti. सत्संग मनुष्यों का कुछ भी नहीं करता।
उत्तर:
न
Na
नहीं
6. क्रियापदानां लकारं पुरुषं वचनं च लिखत –
उत्तर:
चिन्तयेत् – विधिलिङ् – प्रथमपुरुषः – एकवचनम् Cintayet – Vidhiliṅ – Prathamapuruṣa – Ekavacanam सोचे (आज्ञा/उपदेश)
करिष्यति – लृट् – प्रथमपुरुषः – एकवचनम् Kariṣyati – Lṛṭ – Prathamapuruṣa – Ekavacanam करेगा (भविष्य काल)
ब्रूयात् – विधिलिङ् – प्रथमपुरुषः – एकवचनम् Brūyāt – Vidhiliṅ – Prathamapuruṣa – Ekavacanam बोले (चाहिए)
सिञ्चति – लट् – प्रथमपुरुषः – एकवचनम् Siñcati – Laṭ – Prathamapuruṣa – Ekavacanam सींचता है
चिन्तयेत् – विधिलिङ् – प्रथमपुरुषः – एकवचनम् Cintayet – Vidhiliṅ – Prathamapuruṣa – Ekavacanam सोचे (आज्ञा/उपदेश)
करिष्यति – लृट् – प्रथमपुरुषः – एकवचनम् Kariṣyati – Lṛṭ – Prathamapuruṣa – Ekavacanam करेगा (भविष्य काल)
ब्रूयात् – विधिलिङ् – प्रथमपुरुषः – एकवचनम् Brūyāt – Vidhiliṅ – Prathamapuruṣa – Ekavacanam बोले (चाहिए)
सिञ्चति – लट् – प्रथमपुरुषः – एकवचनम् Siñcati – Laṭ – Prathamapuruṣa – Ekavacanam सींचता है
7. प्रश्ननिर्माणं कुरुत –
(क) मधुरवचनेन जनाः प्रसन्नाः भवन्ति।
Madhuravacanena janāḥ prasannāḥ bhavanti.
मधुर वचन से लोग प्रसन्न होते हैं।
उत्तर:
केन जनाः प्रसन्नाः भवन्ति?
Kena janāḥ prasannāḥ bhavanti?
किससे लोग प्रसन्न होते हैं?
(ख) व्यायामेन शरीरं स्वस्थं भवति। Vyāyāmena śarīraṁ svasthaṁ bhavati. व्यायाम से शरीर स्वस्थ होता है।
उत्तर:
केन शरीरं स्वस्थं भवति?
Kena śarīraṁ svasthaṁ bhavati?
किससे शरीर स्वस्थ होता है?
(ग) मातुः आज्ञां पालयेत्। Mātuḥ ājñāṁ pālayet. माता की आज्ञा का पालन करना चाहिए।
उत्तर:
कस्याः आज्ञां पालयेत्?
Kasyāḥ ājñāṁ pālayet?
किसकी आज्ञा का पालन करना चाहिए?
(घ) वृक्षैः प्राणवायुः प्राप्यते। Vṛkṣaiḥ prāṇavāyuḥ prāpyate. वृक्षों से प्राणवायु मिलती है।
उत्तर:
कैः प्राणवायुः प्राप्यते?
Kaiḥ prāṇavāyuḥ prāpyate?
किससे प्राणवायु प्राप्त होती है?
पाठसार / Moral
यह पाठ सिखाता है कि क्षमा, सत्य, प्रिय वचन और सत्संग जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं। माता-पिता का सम्मान, मधुर वाणी और सत्य आचरण मनुष्य का वास्तविक धर्म है। सत्संग से बुद्धि, कीर्ति और लक्ष्मी की वृद्धि होती है।
क्षमा: कण्ठश्रेण विद्यामर्थं च चिन्तयेत्।
क्षान्त्यागो कुतो विद्या कुतो धनम्॥
क्षान्त्यागो कुतो विद्या कुतो धनम्॥
भावार्थ:
मनुष्य को क्षमा और धैर्य को जीवन में धारण करके ही विद्या और धन के विषय में सोचना चाहिए। जहाँ क्षमा का त्याग कर दिया जाता है, वहाँ न विद्या प्राप्त होती है और न ही धन।
मनुष्य को क्षमा और धैर्य को जीवन में धारण करके ही विद्या और धन के विषय में सोचना चाहिए। जहाँ क्षमा का त्याग कर दिया जाता है, वहाँ न विद्या प्राप्त होती है और न ही धन।
प्रथमे नास्ति विद्या द्वितीये नास्ति धनम्।
तृतीये नास्ति पुण्यं चतुर्थे किं करिष्यति॥
तृतीये नास्ति पुण्यं चतुर्थे किं करिष्यति॥
भावार्थ:
यदि जीवन के पहले चरण में विद्या न हो, दूसरे में धन न हो और तीसरे में पुण्य न हो, तो चौथा चरण (बुढ़ापा) व्यर्थ हो जाता है। अतः जीवन के प्रत्येक चरण का सही उपयोग करना चाहिए।
यदि जीवन के पहले चरण में विद्या न हो, दूसरे में धन न हो और तीसरे में पुण्य न हो, तो चौथा चरण (बुढ़ापा) व्यर्थ हो जाता है। अतः जीवन के प्रत्येक चरण का सही उपयोग करना चाहिए।
सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयः पिता।
मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत्॥
मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत्॥
भावार्थ:
माता सभी तीर्थों के समान और पिता सभी देवताओं के समान माने गए हैं। इसलिए मनुष्य को माता-पिता की पूरे मन और प्रयत्न से सेवा व सम्मान करना चाहिए।
माता सभी तीर्थों के समान और पिता सभी देवताओं के समान माने गए हैं। इसलिए मनुष्य को माता-पिता की पूरे मन और प्रयत्न से सेवा व सम्मान करना चाहिए।
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥
भावार्थ:
मधुर और प्रिय वचन बोलने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं। इसलिए सदा मधुर वचन ही बोलने चाहिए, बोलने में कंजूसी क्यों?
मधुर और प्रिय वचन बोलने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं। इसलिए सदा मधुर वचन ही बोलने चाहिए, बोलने में कंजूसी क्यों?
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियं।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥
भावार्थ:
सत्य और प्रिय वचन बोलने चाहिए, पर ऐसा सत्य नहीं बोलना चाहिए जो किसी को दुख पहुँचाए। इसी प्रकार प्रिय बोलते समय असत्य नहीं बोलना चाहिए। यही सनातन धर्म का मूल सिद्धांत है।
सत्य और प्रिय वचन बोलने चाहिए, पर ऐसा सत्य नहीं बोलना चाहिए जो किसी को दुख पहुँचाए। इसी प्रकार प्रिय बोलते समय असत्य नहीं बोलना चाहिए। यही सनातन धर्म का मूल सिद्धांत है।