Path – Subhashitani (Lesson 7)
Line by Line Meaning
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
Ayaṁ nijaḥ paro veti gaṇanā laghu-cetasām
यह अपना है, वह पराया है—ऐसी गणना छोटे मन वालों की होती है।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥1॥
Udāra-caritānāṁ tu vasudhaiva kuṭumbakam
परन्तु उदार स्वभाव वालों के लिए पूरी पृथ्वी ही परिवार होती है।
सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
Sarvaṁ paravaśaṁ duḥkhaṁ sarvam ātmavaśaṁ sukham
जो दूसरों के अधीन है वह दुःख है और जो अपने वश में है वही सुख है।
एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥2॥
Etad vidyāt samāsena lakṣaṇaṁ sukha-duḥkhayoḥ
संक्षेप में सुख-दुःख का यही लक्षण जानना चाहिए।
वृथा वृत्तिः समृद्धस्य वृथा दानं दुरात्मनः।
Vṛthā vṛttiḥ samṛddhasya vṛthā dānaṁ durātmanaḥ
सम्पन्न व्यक्ति की बुरी आजीविका व्यर्थ है और दुष्ट का दान भी व्यर्थ है।
वृथा दानं समृद्धस्य वृथा दत्तं दिवापि च॥3॥
Vṛthā dānaṁ samṛddhasya vṛthā dattaṁ divāpi ca
सम्पन्न व्यक्ति का अनुचित दान और दिन में दिया गया दान भी व्यर्थ है।
काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
Kāvyaśāstra-vinodena kālo gacchati dhīmatām
बुद्धिमानों का समय काव्य और शास्त्र के आनन्द में व्यतीत होता है।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन च॥4॥
Vyasanena ca mūrkhāṇāṁ nidrayā kalahena ca
और मूर्खों का समय बुरी आदतों, नींद और झगड़ों में नष्ट होता है।
महान्तं प्राप्य सद्बुद्धेः संत्यजेत लघुजनम्।
Mahāntaṁ prāpya sadbuddheḥ saṁtyajet laghujanam
उत्तम बुद्धि वाला व्यक्ति महान को पाकर तुच्छ लोगों का त्याग कर देता है।
यत्रास्ति सुखकर्माणि कृपाणः किं करिष्यति॥5॥
Yatrāsti sukha-karmāṇi kṛpāṇaḥ kiṁ kariṣyati
जहाँ अच्छे कर्म हैं वहाँ कृपण क्या कर सकेगा?
किं कुलेन विशालस्य विद्यानिहीनस्य देहिनः।
Kiṁ kulena viśālasya vidyānihīnasya dehinaḥ
विद्या से रहित व्यक्ति के महान कुल का क्या लाभ?
विद्यावान् पूज्यते लोके नाविधिः परिजायते॥6॥
Vidyāvān pūjyate loke nāvidhiḥ parijāyate
संसार में विद्वान ही पूज्य होता है, अज्ञानी नहीं।
वेषेण वपुषा वाचा विद्या विनयेन च।
Veṣeṇa vapuṣā vācā vidyā vinayena ca
वेश, शरीर, वाणी, विद्या और विनय से—
वकारः पञ्चभिर्भूतो नरो भवति पूजितः॥7॥
Vakāraḥ pañcabhir bhūto naro bhavati pūjitaḥ
इन पाँच ‘व’ गुणों से युक्त व्यक्ति पूज्य बनता है।
शब्दार्थ (Vocabulary)
| Sanskrit | Pronunciation | Hindi Meaning |
|---|---|---|
| निजः | Nijaḥ | अपना |
| परः | Paraḥ | दूसरा |
| लघुचेतसाम् | Laghu-cetasām | छोटे विचार वाले |
| उदारचरितानाम् | Udāra-caritānām | उदार स्वभाव वाले |
| वसुधा | Vasudhā | पृथ्वी |
| कुटुम्बकम् | Kuṭumbakam | परिवार |
| परवशम् | Paravaśam | दूसरों के अधीन |
| आत्मवशम् | Ātmavaśam | अपने अधीन |
| वृथा | Vṛthā | व्यर्थ |
| दुरात्मनः | Durātmanaḥ | दुष्ट व्यक्ति का |
| धीमताम् | Dhīmatām | बुद्धिमानों का |
| मूर्खाणाम् | Mūrkhāṇām | मूर्खों का |
| व्यसनम् | Vyasanam | बुरी आदत |
| महान्तम् | Mahāntam | महान व्यक्ति |
| लघुजनम् | Laghujanam | तुच्छ व्यक्ति |
| विद्यावान् | Vidyāvān | विद्वान |
| पूज्यते | Pūjyate | पूजा जाता है |
| वेषेण | Veṣeṇa | वेश से |
| वपुषा | Vapuṣā | शरीर से |
| वाचा | Vācā | वाणी से |
| विनयेन | Vinayena | विनम्रता से |
| पूजितः | Pūjitaḥ | पूज्य |
1. उच्चारणं कृत्वा पुस्तिकायां च लिखत
दुःखम्, मुखाणाम्, सुखदुःखयोः, वृद्धिः, काव्यशास्त्रविनोदेन, पञ्चभिर्भूतैः।
Duḥkham, mukhāṇām, sukha-duḥkhayoḥ, vṛddhiḥ, kāvyaśāstra-vinodena, pañcabhir-bhūtaiḥ
दुःख, मुखों का, सुख-दुःख के, वृद्धि, काव्य-शास्त्र के आनंद से, पाँच तत्वों से।
उत्तर:
एते शब्दाः स्पष्टोच्चारणेन पुस्तिकायां लिखनीयाः।
Ete śabdāḥ spaṣṭa-uccāraṇena pustikāyāṁ likhanīyāḥ
इन शब्दों को स्पष्ट उच्चारण के साथ कॉपी में लिखना चाहिए।
2. एकपदेन उत्तरत
(क) उदारचरितानां कुटे सम्पूर्णा वसुधा किम् अस्ति ?
Udāra-caritānāṁ kuṭe sampūrṇā vasudhā kim asti?
उदार स्वभाव वालों के लिए पूरी पृथ्वी क्या है?
उत्तर:
कुटुम्बकम्।
Kuṭumbakam
परिवार।
(ख) अयं निजः परो वेति कः गणयति ?
Ayaṁ nijaḥ paro veti kaḥ gaṇayati?
यह अपना है, वह पराया है—ऐसा कौन सोचता है?
उत्तर:
लघुचेतसाम्।
Laghu-cetasām
छोटे विचार वाले लोग।
(ग) समुद्रेषु वृद्धिः कीदृशी भवति ?
Samudreṣu vṛddhiḥ kīdṛśī bhavati?
समुद्रों में वृद्धि कैसी होती है?
उत्तर:
वृथा।
Vṛthā
व्यर्थ।
(घ) विद्वान् कुत्र पूज्यते ?
Vidyāvān kutra pūjyate?
विद्वान कहाँ पूज्य होता है?
उत्तर:
लोके।
Loke
संसार में।
3. प्रश्नान्तराणि लिखत
(क) सुखदुःखयोः किं लक्षणम् अस्ति ?
Sukha-duḥkhayoḥ kiṁ lakṣaṇam asti?
सुख और दुःख का क्या लक्षण है?
उत्तर:
आत्मवशं सुखं परवशं दुःखम्।
Ātmavaśaṁ sukhaṁ paravaśaṁ duḥkham
अपने वश में सुख और दूसरों के वश में दुःख होता है।
(ख) पञ्चविकाराः के सन्ति ?
Pañca-vikārāḥ ke santi?
पाँच विकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
वेषः, वपुः, वाणी, विद्या, विनयः।
Veṣaḥ, vapuḥ, vāṇī, vidyā, vinayaḥ
वेश, शरीर, वाणी, विद्या और विनय।
(ग) धीमतां कालः कथं गच्छति ?
Dhīmatāṁ kālaḥ kathaṁ gacchati?
बुद्धिमानों का समय कैसे बीतता है?
उत्तर:
काव्यशास्त्रविनोदेन।
Kāvyaśāstra-vinodena
काव्य और शास्त्र के आनंद में।
(घ) दाने वृथा कदा भवति ?
Dāne vṛthā kadā bhavati?
दान कब व्यर्थ होता है?
उत्तर:
दुरात्मनः दाने समृद्धस्य च।
Durātmanaḥ dāne samṛddhasya ca
दुष्ट के दान में और अनुचित रूप से सम्पन्न के दान में।
4. सार्थकवाक्यानि रचयत
लघुकथायां पञ्च क्रियापदानि प्रयुज्य वाक्यानि लिखत।
Laghukathāyāṁ pañca kriyāpadāni prayujya vākyāni likhata
छोटी कथा में पाँच क्रियापदों का प्रयोग कर वाक्य लिखो।
उत्तर:
विद्वान् पठति, चिन्तयति, वदति, शिक्षयति, पूज्यते।
Vidyāvān paṭhati, cintayati, vadati, śikṣayati, pūjyate
विद्वान पढ़ता है, सोचता है, बोलता है, सिखाता है और पूज्य होता है।
5. मञ्जूषातः पदानि चित्वा वाक्यानि पूरयत
(क) सर्वत्र …………… वृद्धिः समुद्रेषु।
Sarvatra ……… vṛddhiḥ samudreṣu
हर जगह ……… वृद्धि समुद्रों में।
उत्तर:
वृथा वृद्धिः समुद्रेषु।
Vṛthā vṛddhiḥ samudreṣu
समुद्रों में वृद्धि व्यर्थ होती है।
(ख) महान्तः प्रायः ………………… ।
Mahāntaḥ prāyaḥ ………
महान लोग प्रायः ……… होते हैं।
उत्तर:
सन्तुष्टाः।
Santuṣṭāḥ
संतुष्ट।
(ग) मुखाणां समयः व्यसनेन निद्रया कलहेन ………………… ।
Mukhāṇāṁ samayaḥ vyasanena nidrayā kalahena ………
मूर्खों का समय बुरी आदत, नींद और झगड़े में ……… होता है।
उत्तर:
गच्छति।
Gacchati
बीतता है।
(घ) वेशेन वपुषा वाचा ………………… विनयेन च।
Veśena vapuṣā vācā ……… vinayena ca
वेश, शरीर, वाणी, ……… और विनय से।
उत्तर:
विद्या।
Vidyā
विद्या।
6. विलोमपदानि योजयत
निजः — परः, सबलः — दुर्बलः, उदारः — कृपणः।
Nijaḥ–paraḥ, sabalaḥ–durbalaḥ, udāraḥ–kṛpaṇaḥ
अपना–पराया, बलवान–निर्बल, उदार–कृपण।
उत्तर:
एते विलोमपदानि सन्ति।
Ete vilomapadāni santi
ये विलोम शब्द हैं।
7. हिन्दीभाषायाम् अनुवादं कुरुत्
(क) सर्वे परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
Sarve paravaśaṁ duḥkhaṁ sarvam ātmavaśaṁ sukham
सब कुछ दूसरों के अधीन दुःख है, अपने अधीन सुख है।
उत्तर:
दूसरों पर निर्भर रहना दुःख है और अपने नियंत्रण में रहना सुख है।
(ख) वृथा तृप्तस्य भोजनम्।
Vṛthā tṛptasya bhojanam
तृप्त व्यक्ति का भोजन व्यर्थ है।
उत्तर:
भरे पेट वाले का भोजन बेकार है।
(ग) महान्तं प्रायः सन्तुष्टाः।
Mahāntaṁ prāyaḥ santuṣṭāḥ
महान लोग प्रायः संतुष्ट होते हैं।
उत्तर:
महान व्यक्ति सामान्यतः संतोषी होते हैं।
(घ) विद्वान् पूज्यते लोके नाविद्यः परिपूज्यते।
Vidyāvān pūjyate loke nāvidyaḥ paripūjyate
संसार में विद्वान पूज्य होता है, अज्ञानी नहीं।
उत्तर:
समाज में विद्वान का सम्मान होता है, अज्ञानी का नहीं।