Path – Bhavya Bhagirathi
हिमाद्रेः समुत्था विकससि तदुदके हिममये,
ततो भूमिं याताः विचरसि सुहासा समते।
पुनासि त्वं लोकान् प्रवहसि समुद्रं प्रति सदा,
अहो दिव्ये गङ्गे! भवतु सुखदं नस्तव जलम्॥1॥ Himādreḥ samutthā vikasasi tadudake himamaye,
tato bhūmiṁ yātāḥ vicarasi suhāsā samate |
punāsi tvaṁ lokān pravahasi samudraṁ prati sadā,
aho divye Gaṅge! bhavatu sukhadaṁ nastava jalam || हे दिव्य गंगा! तुम हिमालय से निकलकर हिमयुक्त जल में प्रवाहित होती हो, फिर पृथ्वी पर आकर सुंदर रूप से विचरण करती हो। तुम सदा लोगों को पवित्र करती हुई समुद्र की ओर बहती हो। हे गंगे! तुम्हारा जल हमारे लिए सुखद हो।
ततो भूमिं याताः विचरसि सुहासा समते।
पुनासि त्वं लोकान् प्रवहसि समुद्रं प्रति सदा,
अहो दिव्ये गङ्गे! भवतु सुखदं नस्तव जलम्॥1॥ Himādreḥ samutthā vikasasi tadudake himamaye,
tato bhūmiṁ yātāḥ vicarasi suhāsā samate |
punāsi tvaṁ lokān pravahasi samudraṁ prati sadā,
aho divye Gaṅge! bhavatu sukhadaṁ nastava jalam || हे दिव्य गंगा! तुम हिमालय से निकलकर हिमयुक्त जल में प्रवाहित होती हो, फिर पृथ्वी पर आकर सुंदर रूप से विचरण करती हो। तुम सदा लोगों को पवित्र करती हुई समुद्र की ओर बहती हो। हे गंगे! तुम्हारा जल हमारे लिए सुखद हो।
भावार्थ:
इस श्लोक में गंगा के उद्गम, उसकी पवित्रता और मानव जीवन के लिए उसके कल्याणकारी स्वरूप का वर्णन है। गंगा का जल जीवनदायिनी और मंगलकारी बताया गया है।
इस श्लोक में गंगा के उद्गम, उसकी पवित्रता और मानव जीवन के लिए उसके कल्याणकारी स्वरूप का वर्णन है। गंगा का जल जीवनदायिनी और मंगलकारी बताया गया है।
न जाने किं पुण्यं फलितमधुना नो भवति,
प्रियो देशो जातः तव जलकणैः स्पृष्टकुलः।
हरिद्वार काशी तव तटमहं कथ्यते,
प्रयागस्तीर्थानां पतिरपि नमस्ते तटे॥2॥ Na jāne kiṁ puṇyaṁ phalitamadhunā no bhavati,
priyo deśo jātaḥ tava jalakaṇaiḥ spṛṣṭakulaḥ |
Haridvāra Kāśī tava taṭamahaṁ kathyate,
Prayāgastīrthānāṁ patirapi namaste taṭe || न जाने हमारे कौन से पुण्य आज फलित हुए हैं, कि तुम्हारे जल से स्पर्शित हमारा देश प्रिय हो गया है। हरिद्वार और काशी तुम्हारे महान तट कहलाते हैं, और प्रयाग तीर्थों का स्वामी है—उस तट को भी नमस्कार।
प्रियो देशो जातः तव जलकणैः स्पृष्टकुलः।
हरिद्वार काशी तव तटमहं कथ्यते,
प्रयागस्तीर्थानां पतिरपि नमस्ते तटे॥2॥ Na jāne kiṁ puṇyaṁ phalitamadhunā no bhavati,
priyo deśo jātaḥ tava jalakaṇaiḥ spṛṣṭakulaḥ |
Haridvāra Kāśī tava taṭamahaṁ kathyate,
Prayāgastīrthānāṁ patirapi namaste taṭe || न जाने हमारे कौन से पुण्य आज फलित हुए हैं, कि तुम्हारे जल से स्पर्शित हमारा देश प्रिय हो गया है। हरिद्वार और काशी तुम्हारे महान तट कहलाते हैं, और प्रयाग तीर्थों का स्वामी है—उस तट को भी नमस्कार।
भावार्थ:
यह श्लोक भारतभूमि को पवित्र बनाने वाली गंगा की महिमा तथा हरिद्वार, काशी और प्रयाग जैसे पवित्र तीर्थों की महत्ता को प्रकट करता है।
यह श्लोक भारतभूमि को पवित्र बनाने वाली गंगा की महिमा तथा हरिद्वार, काशी और प्रयाग जैसे पवित्र तीर्थों की महत्ता को प्रकट करता है।
जनानां धात्रि त्वं सुमधुर-फलानि ददाति,
विशालां सिञ्चन्ती मधुमयजलैर्भारतमिदम्।
अये शुभ्रे गङ्गे! विलससि तरङ्गैः प्रियये,
त्वतो लोके धन्याः शिशव इव खेलन्ति मनुजाः॥3॥ Janānāṁ dhātri tvaṁ sumadhura-phalāni dadāti,
viśālāṁ siñcantī madhumayajalair Bhāratamidam |
aye śubhre Gaṅge! vilasasi taraṅgaiḥ priyaye,
tvato loke dhanyāḥ śiśava iva khelanti manuṣyāḥ || हे गंगे! तुम लोगों का पालन करने वाली हो, मीठे फल देती हुई मधुर जल से विशाल भारत को सींचती हो। हे शुभ्र गंगे! तुम तरंगों से शोभित हो, तुम्हारे तटों पर मनुष्य बच्चों की भाँति आनंद से खेलते हैं।
विशालां सिञ्चन्ती मधुमयजलैर्भारतमिदम्।
अये शुभ्रे गङ्गे! विलससि तरङ्गैः प्रियये,
त्वतो लोके धन्याः शिशव इव खेलन्ति मनुजाः॥3॥ Janānāṁ dhātri tvaṁ sumadhura-phalāni dadāti,
viśālāṁ siñcantī madhumayajalair Bhāratamidam |
aye śubhre Gaṅge! vilasasi taraṅgaiḥ priyaye,
tvato loke dhanyāḥ śiśava iva khelanti manuṣyāḥ || हे गंगे! तुम लोगों का पालन करने वाली हो, मीठे फल देती हुई मधुर जल से विशाल भारत को सींचती हो। हे शुभ्र गंगे! तुम तरंगों से शोभित हो, तुम्हारे तटों पर मनुष्य बच्चों की भाँति आनंद से खेलते हैं।
भावार्थ:
इस श्लोक में गंगा को भारत की पालनकर्त्री बताया गया है, जो अपने मधुर जल से देश को समृद्ध बनाती है और लोगों को आनंद प्रदान करती है।
इस श्लोक में गंगा को भारत की पालनकर्त्री बताया गया है, जो अपने मधुर जल से देश को समृद्ध बनाती है और लोगों को आनंद प्रदान करती है।
पर्यस्ते कूलाभिर्धरति बहु दत्तं सुमधुरम्,
ततः सिक्तं क्षेत्रं भवति हरितं चापि ललितम्।
गभीरै ते नीरै तरणिषु सुखं यान्ति पथिकाः,
वयं भूयो भूयो जगति तव कूलैरुपकृताः॥4॥ Paryaste kūlābhirdharati bahu dattaṁ sumadhuram,
tataḥ siktaṁ kṣetraṁ bhavati haritaṁ cāpi lalitam |
gabhīrai te nīrai taraṇiṣu sukhaṁ yānti pathikāḥ,
vayaṁ bhūyo bhūyo jagati tava kūlairupakṛtāḥ || तुम नहरों द्वारा बहुत मधुर जल प्रदान करती हो, जिससे सींचे गए खेत हरे-भरे और सुंदर हो जाते हैं। तुम्हारे गहरे जल में नौकाओं से यात्री सुखपूर्वक जाते हैं, हम बार-बार तुम्हारे तटों से उपकृत होते हैं।
ततः सिक्तं क्षेत्रं भवति हरितं चापि ललितम्।
गभीरै ते नीरै तरणिषु सुखं यान्ति पथिकाः,
वयं भूयो भूयो जगति तव कूलैरुपकृताः॥4॥ Paryaste kūlābhirdharati bahu dattaṁ sumadhuram,
tataḥ siktaṁ kṣetraṁ bhavati haritaṁ cāpi lalitam |
gabhīrai te nīrai taraṇiṣu sukhaṁ yānti pathikāḥ,
vayaṁ bhūyo bhūyo jagati tava kūlairupakṛtāḥ || तुम नहरों द्वारा बहुत मधुर जल प्रदान करती हो, जिससे सींचे गए खेत हरे-भरे और सुंदर हो जाते हैं। तुम्हारे गहरे जल में नौकाओं से यात्री सुखपूर्वक जाते हैं, हम बार-बार तुम्हारे तटों से उपकृत होते हैं।
भावार्थ:
यह श्लोक गंगा की आर्थिक और सामाजिक उपयोगिता को दर्शाता है— कृषि, यातायात और मानव कल्याण में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
यह श्लोक गंगा की आर्थिक और सामाजिक उपयोगिता को दर्शाता है— कृषि, यातायात और मानव कल्याण में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
अये पुण्ये गङ्गे! जगति जनन चैवम पुनः,
भवेद् क्रीडाभूमिः पुनरपि शुभा भारतधरा।
सदा सेवै नीरं सुखयतु ! तवैतत् सुखकरम्,
न मे दैव्या स्पर्धा तव तटविहारैः विहरितः॥5॥ Aye puṇye Gaṅge! jagati janana caivam punaḥ,
bhaved krīḍābhūmiḥ punarapi śubhā Bhāratadharā |
sadā sevai nīraṁ sukhayatu! tavaitat sukhakaram,
na me daivyā spardhā tava taṭavihāraiḥ vihṛitaḥ || हे पुण्यस्वरूपा गंगे! तुम्हारे कारण यह भारतभूमि फिर से शुभ और क्रीड़ाभूमि बने। तुम्हारा जल सदा सेवा द्वारा सुख प्रदान करे, तुम्हारे तटों पर विचरण करने में मुझे कोई ईर्ष्या नहीं।
भवेद् क्रीडाभूमिः पुनरपि शुभा भारतधरा।
सदा सेवै नीरं सुखयतु ! तवैतत् सुखकरम्,
न मे दैव्या स्पर्धा तव तटविहारैः विहरितः॥5॥ Aye puṇye Gaṅge! jagati janana caivam punaḥ,
bhaved krīḍābhūmiḥ punarapi śubhā Bhāratadharā |
sadā sevai nīraṁ sukhayatu! tavaitat sukhakaram,
na me daivyā spardhā tava taṭavihāraiḥ vihṛitaḥ || हे पुण्यस्वरूपा गंगे! तुम्हारे कारण यह भारतभूमि फिर से शुभ और क्रीड़ाभूमि बने। तुम्हारा जल सदा सेवा द्वारा सुख प्रदान करे, तुम्हारे तटों पर विचरण करने में मुझे कोई ईर्ष्या नहीं।
भावार्थ:
अंतिम श्लोक में गंगा से प्रार्थना की गई है कि वह भारत को सदा सुखी, पवित्र और समृद्ध बनाए रखे।
शब्दार्थ (Vocabulary)
अंतिम श्लोक में गंगा से प्रार्थना की गई है कि वह भारत को सदा सुखी, पवित्र और समृद्ध बनाए रखे।
| Sanskrit | Pronunciation | Hindi Meaning |
|---|---|---|
| हिमाद्रेः | Himādreḥ | हिमालय पर्वत से |
| समुत्था | Samutthā | उत्पन्न हुई |
| विकससि | Vikasasi | विकसित होती हो |
| सुहासा | Suhāsā | सुन्दर मुस्कान वाली |
| पुनासि | Punāsi | पवित्र करती हो |
| प्रवहसि | Pravahasi | बहती हो |
| समुद्रम् | Samudram | सागर |
| सुखदम् | Sukhadam | सुख देने वाला |
| जलकणैः | Jalakaṇaiḥ | जल की बूँदों से |
| स्पृष्ट | Spṛṣṭa | स्पर्श किया हुआ |
| तीर्थानाम् | Tīrthānām | तीर्थों का |
| पतिः | Patiḥ | स्वामी |
| धात्री | Dhātrī | पालन करने वाली |
| सिञ्चन्ती | Siñcantī | सींचती हुई |
| मधुमय | Madhumaya | मधुर |
| तरङ्गैः | Taraṅgaiḥ | लहरों से |
| धन्याः | Dhanyāḥ | भाग्यशाली |
| कूलैः | Kūlaiḥ | तटों से |
| उपकृताः | Upakṛtāḥ | उपकार पाए हुए |
| गभीरैः | Gabhīraiḥ | गहरे |
| तरणिषु | Taraṇiṣu | नौकाओं में |
| पथिकाः | Pathikāḥ | यात्री |
| क्रीडाभूमिः | Krīḍābhūmiḥ | खेलने का स्थान |
| सेवै | Sevai | सेवा से |
| विहारैः | Vihāraiḥ | विचरण से |
Path – Bhavya Bhagirathi
1. उच्चारणं कृत्वा पुस्तिकायां च लिखत
हिमाद्रेः, तदुदके, जलकणैःस्पृष्टकुलः, फलानि, मधुमयजलैर्भारतम्, तवतो लोके, कुल्याभिर्जगति, क्रीडाभूमिः, कूलेरुपकृताः
Himādreḥ, Tadudake, Jalakaṇaiḥ spṛṣṭakulaḥ, Phalāni, Madhumayajalair Bhāratam, Tavato loke, Kulyābhir jagati, Krīḍābhūmiḥ, Kūler upakṛtāḥ
हिमालय से, उसके जल में, जल-कणों से स्पर्श किया हुआ कुल, फल, मधुर जल से भारत, तुम्हारे लोक में, नहरों से जगत में, खेल का मैदान, तटों से उपकृत।
2. एकपदेन उत्तरत
(क) गङ्गा कुतः समुत्था ?
(Ka) Gaṅgā kutaḥ samutthā?
गंगा कहाँ से निकली है?
उत्तर:
हिमाद्रेः।
Himādreḥ
हिमालय से।
(ख) तीर्थानां पतिः कः ?
(Kha) Tīrthānāṁ patiḥ kaḥ?
तीर्थों का स्वामी कौन है?
उत्तर:
प्रयागः।
Prayāgaḥ
प्रयाग।
(ग) गङ्गायाः पयः काभिः बहुधा सिञ्चति ?
(Ga) Gaṅgāyāḥ payaḥ kābhiḥ bahudhā siñcati?
गंगा का जल किनसे अनेक प्रकार से सींचता है?
उत्तर:
कुल्याभिः।
Kulyābhiḥ
नहरों से।
(घ) गङ्गायाः गभीरै नीरै तरणिषु के सुखं यान्ति ?
(Gha) Gaṅgāyāḥ gabhīraiḥ nīraiḥ taraṇiṣu ke sukhaṁ yānti?
गंगा के गहरे जल में नौकाओं पर कौन सुख से जाते हैं?
उत्तर:
पथिकाः।
Pathikāḥ
यात्री।
(ङ) भागीरथी कान् पुनाति ?
(Ṅa) Bhāgīrathī kān punāti?
भागीरथी किन्हें पवित्र करती है?
उत्तर:
लोकान्।
Lokān
लोगों को।
3. पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) गङ्गातटे कति प्रसिद्धानि नगराणि स्थितानि ?
(Ka) Gaṅgātaṭe kati prasiddhāni nagarāṇi sthitāni?
गंगा के तट पर कितने प्रसिद्ध नगर स्थित हैं?
उत्तर:
हरिद्वारं काशी च द्वे प्रसिद्धे नगरे स्तः।
Haridvāraṁ Kāśī ca dve prasiddhe nagare staḥ
हरिद्वार और काशी दो प्रसिद्ध नगर हैं।
(ख) गङ्गा-जलात् सिक्तं क्षेत्रं कीदृशं भवति ?
(Kha) Gaṅgā-jalāt siktaṁ kṣetraṁ kīdṛśaṁ bhavati?
गंगा के जल से सींचा गया खेत कैसा हो जाता है?
उत्तर:
हरितं ललितं च भवति।
Haritaṁ lalitaṁ ca bhavati
हरा-भरा और सुंदर हो जाता है।
(ग) गङ्गा कीदृशैः जलैः भारतभूमिं सिञ्चति ?
(Ga) Gaṅgā kīdṛśaiḥ jalaiḥ Bhāratabhūmiṁ siñcati?
गंगा किस प्रकार के जल से भारत भूमि को सींचती है?
उत्तर:
मधुमयजलैः भारतभूमिं सिञ्चति।
Madhumayajalaiḥ Bhāratabhūmiṁ siñcati
मधुर जल से भारत भूमि को सींचती है।
(घ) भागीरथ्याः उदरेषु के शिशवः इव खेलन्ति ?
(Gha) Bhāgīrathyāḥ udareṣu ke śiśavaḥ iva khelanti?
भागीरथी की गोद में बच्चे किसके समान खेलते हैं?
उत्तर:
मनुजाः शिशवः इव खेलन्ति।
Manujāḥ śiśavaḥ iva khelanti
मनुष्य बच्चे की तरह खेलते हैं।
4. सन्धि-विच्छेदः
मेद्या:
मे + अद्या
Me + adyā
मेरे + आज
तवोत्सङ्गे:
तव + उत्सङ्गे
Tava + utsaṅge
तुम्हारी + गोद में
मधुमयजलैर्भारतभूमम्:
मधुमयजलैः + भारतभूमम्
Madhumayajalaiḥ + Bhāratabhūmam
मधुर जलों से + भारत भूमि
तवैवम्:
तव + एवम्
Tava + evam
तुम्हारा + ऐसा
5. संस्कृतभाषायाम् अनुवादं कुरुत
(क)
गङ्गा सर्वासु नदीषु श्रेष्ठा अस्ति।
Gaṅgā sarvāsu nadīṣu śreṣṭhā asti
गंगा सभी नदियों में श्रेष्ठ है।
(ख)
अस्याः जलं शीतलं पवित्रं च अस्ति।
Asyāḥ jalaṁ śītalaṁ pavitraṁ ca asti
इसका जल शीतल एवं पवित्र है।
(ग)
पर्यटकाः गङ्गायां नौकाविहारं कुर्वन्ति।
Paryaṭakāḥ Gaṅgāyāṁ naukāvihāraṁ kurvanti
पर्यटक गंगा में नौका-विहार करते हैं।
(घ)
जनाः गङ्गातटे उपविश्य तपः कुर्वन्ति।
Janāḥ Gaṅgātaṭe upaviśya tapaḥ kurvanti
लोग गंगा-तट पर बैठकर तप करते हैं।
(ङ)
वाराणस्यां गङ्गातटः अतीव सुन्दरः अस्ति।
Vārāṇasyāṁ Gaṅgātaṭaḥ atīva sundaraḥ asti
वाराणसी में गंगा का तट बहुत सुन्दर है।
6. प्रश्न-निर्माणम्
(क)
गङ्गा कुतः समुत्था?
Gaṅgā kutaḥ samutthā?
गंगा कहाँ से निकली है?
(ख)
गङ्गा कान् पुनाति?
Gaṅgā kān punāti?
गंगा किन्हें पवित्र करती है?
(ग)
हरिद्वारं काशी च कस्य तटमहत्त्वं कथ्यते?
Haridvāraṁ Kāśī ca kasya taṭamahattvaṁ kathyate?
हरिद्वार और काशी किसके तट का महत्त्व बताते हैं?
(घ)
पर्यटकाः केन व्रजन्ति?
Paryaṭakāḥ kena vrajanti?
पर्यटक किससे जाते हैं?
7. समानार्थक-पदानि
गङ्गा —
जाह्नवी
Jāhnavī
गंगा का अन्य नाम
हिमालयः —
हिमगिरिः
Himagiriḥ
हिमालय
समुद्रः —
जलधिः
Jaladhiḥ
समुद्र
जलम् —
वारि
Vāri
जल