Lesson : 11 – Ramabharatayoh Melapah – Class : 8

इस पाठ में राम और भरत के पावन मिलन का भावपूर्ण चित्रण है। भरत वन में राम से मिलने आते हैं और अत्यन्त विनम्रता, श्रद्धा व भ्रातृप्रेम प्रकट करते हैं। राम भरत के प्रेम, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा से प्रसन्न होते हैं। भरत राज्य को स्वीकार करने के स्थान पर राम की पादुकाएँ लेकर उन्हें राज्य का प्रतीक मानते हैं और चौदह वर्ष तक राम के प्रतिनिधि रूप में शासन करने का संकल्प लेते हैं। यह कथा भ्रातृप्रेम, त्याग, आज्ञापालन और आदर्श नेतृत्व का संदेश देती है।

Path – Ramabharatayoh Melapah

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(ततः प्रविशति भरतः रथेन सुमनः सूतः) (Tataḥ praviśati Bharataḥ rathena Sumanāḥ sūtaḥ) तत्पश्चात् सुमन्त्र सारथी के साथ भरत रथ से प्रवेश करता है।
भरतः — भोः तात! (Bharataḥ — bhoḥ tāta) भरत बोले — हे तात!
सुमन्त्रः — कुमार! आगच्छामि। (Sumantraḥ — kumāra! āgacchāmi) सुमन्त्र बोले — कुमार! मैं आ रहा हूँ।
भरतः — क्व तत्र भवान् मम आर्यः रामः? (Bharataḥ — kva tatra bhavān mama āryaḥ Rāmaḥ) भरत बोले — मेरे पूज्य भ्राता राम कहाँ हैं?
सुमन्त्रः — कुमार! एतस्मिन् एव आश्रमे रामः सीता लक्ष्मणश्च स्थिताः। (Sumantraḥ — kumāra! etasmin eva āśrame Rāmaḥ Sītā Lakṣmaṇaśca sthitāḥ) सुमन्त्र बोले — कुमार! इसी आश्रम में राम, सीता और लक्ष्मण रहते हैं।
भरतः — भोः तात! निवेदय निवेदनम्। (Bharataḥ — bhoḥ tāta! nivedaya nivedanam) भरत बोले — हे तात! मेरा संदेश निवेदित कीजिए।
सुमन्त्रः — कुमार! किमिति निवेदये? (Sumantraḥ — kumāra! kim iti nivedaye) सुमन्त्र बोले — कुमार! क्या निवेदन करूँ?
भरतः — राजवल्लभायाः कैकेय्याः पुत्रः भरतः प्राप्तः इति। (Bharataḥ — rājavallabhāyāḥ Kaikeyyāḥ putraḥ Bharataḥ prāptaḥ iti) भरत बोले — रानी कैकेयी का पुत्र भरत आया है, यह कहिए।
रामः — सर्वथा न अयम् अवाञ्छनीयः स्वरस्ययोगः। (Rāmaḥ — sarvathā na ayam avāñchanīyaḥ svarasya-yogaḥ) राम बोले — यह स्वर मुझे बिल्कुल भी प्रिय नहीं लगता।
कैकेय्याः मे हृदयं व्रणं लक्ष्मण! दृश्यतां तावत्। (Kaikeyyāḥ me hṛdayaṁ vraṇaṁ Lakṣmaṇa! dṛśyatāṁ tāvat) हे लक्ष्मण! कैकेयी का स्मरण मेरे हृदय को आहत करता है।
लक्ष्मणः — यदाज्ञापयति आर्यः। (Lakṣmaṇaḥ — yad ājñāpayati āryaḥ) लक्ष्मण बोले — जैसा मेरे पूज्य भ्राता आदेश दें।
(परिक्रमति) एहि एहि इच्छकुमार! स्वागतम्। (Parikramati) ehi ehi iccha-kumāra! svāgatam (घूमते हुए) आओ, आओ इच्छुक राजकुमार! स्वागत है।
भरतः — अनुगृहीतोऽस्मि। (Bharataḥ — anugṛhīto’smi) भरत बोले — मैं कृतार्थ हुआ।
लक्ष्मणः — बाहू (उपेत्य) जयतु आर्यः। (Lakṣmaṇaḥ — bāhū upetya jayatu āryaḥ) लक्ष्मण बोले — (बाहें फैलाकर) आर्य की जय हो।
अथ तं दृष्ट्वा भ्राता भरतो भ्रातृवत्सलः। (Atha taṁ dṛṣṭvā bhrātā Bharato bhrātṛ-vatsalaḥ) तब भाई भरत, जो भ्राता-प्रेमी थे, उन्हें देखकर—
संकल्पं यत्र ते रूपमर्थ इव तिष्ठति॥ (Saṅkalpaṁ yatra te rūpam artha iva tiṣṭhati) जहाँ उनके संकल्प का स्वरूप साकार अर्थ की भाँति प्रकट होता है।
सीता — आर्यपुत्र! किं भरतः आगतः? (Sītā — āryaputra! kiṁ Bharataḥ āgataḥ) सीता बोलीं — हे आर्यपुत्र! क्या भरत आए हैं?
रामः — सत्यमेव शीघ्रं प्रविशता कुमार! सीता स्वयं गच्छतु। (Rāmaḥ — satyam eva śīghraṁ praviśatā kumāra! Sītā svayaṁ gacchatu) राम बोले — हाँ, शीघ्र आ रहे हैं। सीता स्वयं जाएँ।
सीता — यदाज्ञापति आर्यः। (Sītā — yad ājñāpati āryaḥ) सीता बोलीं — जैसी आज्ञा हो।
(उत्थाय परिक्रमति) (Utthāya parikramati) (उठकर आगे जाती हैं)
भरतः — आर्य! अभिवादये, भरतोऽहमस्मि। (Bharataḥ — ārya! abhivādaye, Bharato’ham asmi) भरत बोले — हे आर्य! मैं भरत हूँ, प्रणाम करता हूँ।
सीता — चिरं जीव! एहि वत्स! आश्रममेव पूर्यताम्। (Sītā — ciraṁ jīva! ehi vatsa! āśramam eva pūryatām) सीता बोलीं — दीर्घायु हो! आओ पुत्र! आश्रम को पवित्र करो।
भरतः — (राममुपगम्य) आर्य! अभिवादये, भरतोऽहमस्मि। (Bharataḥ — Rāmam upagamya ārya! abhivādaye, Bharato’ham asmi) (राम के पास जाकर) हे आर्य! मैं भरत हूँ, प्रणाम करता हूँ।
रामः — (सहर्षम्) स्वस्ति आयुष्मान् भव! सुप्रियेण भुजद्वयेन माम् आलिङ्ग। (Rāmaḥ — saharṣam svasti āyuṣmān bhava! supriyeṇa bhujadvayena mām āliṅga) राम बोले — (हर्ष से) मंगल हो! प्रेमपूर्वक मुझे आलिंगन करो।
भरतः — अनुगृहीतोऽस्मि। प्रसीद आर्यः। (Bharataḥ — anugṛhīto’smi, prasīda āryaḥ) भरत बोले — मैं कृतार्थ हूँ, कृपा करें।
सुमन्त्रः — अयोध्यायाम् अभिषेकोऽद्य क्व तिष्ठतु। (Sumantraḥ — Ayodhyāyām abhiṣeko’dya kva tiṣṭhatu) सुमन्त्र बोले — आज अयोध्या में अभिषेक कहाँ हो?
रामः — यत्र मे मातृभिः सहितं, तत्रैव तावत् तिष्ठतु। (Rāmaḥ — yatra me mātṛbhiḥ sahitaṁ, tatra eva tāvat tiṣṭhatu) राम बोले — जहाँ मेरी माताएँ हैं, वहीं ठहरे।
भरतः — हन्त! अनुत्तरस्माहमिह। (Bharataḥ — hanta! anuttaro’smi aham iha) भरत बोले — अहो! मैं निरुत्तर हूँ।
परं तु मम हस्ते निःक्षिप्य तव राज्यं चतुर्दश वर्षाणि प्रतिनिर्वर्तयिष्यामि। (Paraṁ tu mama haste nikṣipya tava rājyaṁ caturdaśa varṣāṇi pratinirvartayiṣyāmi) किन्तु मैं आपके राज्य को अपने हाथों से सँभालकर चौदह वर्ष तक चलाऊँगा।
रामः — एवमस्तु। (Rāmaḥ — evam astu) राम बोले — ऐसा ही हो।
भरतः — आर्य! अन्यामपि वरं इच्छामि। (Bharataḥ — ārya! anyām api varaṁ icchāmi) भरत बोले — हे आर्य! मैं एक और वर चाहता हूँ।
रामः — वत्स! किम् इच्छसि? किम् अहं ददामि? (Rāmaḥ — vatsa! kim icchasi? kim ahaṁ dadāmi) राम बोले — पुत्र! क्या चाहते हो? क्या दूँ?
भरतः — पादोपभुक्ते एते तव पादुके मे प्रयच्छ। (Bharataḥ — pādopabhukte ete tava pāduke me prayaccha) भरत बोले — आपके चरणों की ये पादुकाएँ मुझे दीजिए।
रामः — तथास्तु। वत्स! गृहाण। (Rāmaḥ — tathāstu. vatsa! gṛhāṇa) राम बोले — तथास्तु। पुत्र! इन्हें ग्रहण करो।
शब्दार्थ
SanskritPronunciationHindi Meaning
मेलापःMelāpaḥमिलन
आश्रमेĀśrameआश्रम में
आर्यःĀryaḥपूज्य
निवेदनम्Nivedanamसूचना
स्वागतम्Svāgatamस्वागत
अनुगृहीतःAnugṛhītaḥकृतज्ञ
भ्रातृवत्सलःBhrātṛvatsalaḥभाई से प्रेम करने वाला
आलिङ्गĀliṅgaआलिंगन
पादुकेPādukeखड़ाऊँ
प्रयच्छPrayacchaदे दीजिए
स्वस्तिSvastiकल्याण
आयुष्मान्Āyuṣmānदीर्घायु
वरम्Varamवरदान
अन्यापिAnyāpiदूसरी भी
प्रतिनिर्वर्तयिष्यामिPratinirva
rtayiṣyāmi
लौटा दूँगा
चतुर्दशCaturdaśaचौदह
वर्षाणिVarṣāṇiवर्ष
राज्यम्Rājyamराज्य
भुजद्वयेनBhujadvayenaदोनों भुजाओं से
सहर्षम्Saharṣamहर्षपूर्वक
कुमारःKumāraḥराजकुमार
रथेनRathenaरथ से
सूतोःSūtaḥसारथी
कैकेयीKaikeyīकैकेयी
लक्ष्मणःLakṣmaṇaḥलक्ष्मण
अभ्यास
1. उच्चारणं कृत्वा पुस्तिकायां च लिखत—
राज्यलुब्धायाः Rājya-lubdhāyāḥ राज्य की लोभी (कैकेयी) क्लेदयति Kledayati गीला करता है इच्छाकुमारः Icchā-kumāraḥ इच्छुक कुमार अनुगृहीतोऽस्मि Anugṛhīto’smi मैं अनुगृहीत हुआ हूँ अनुत्तरस्मिहितम् Anuttarasmi-hitām अत्यन्त श्रेष्ठ स्थिति चतुर्दशवर्षाणि Caturdaśa-varṣāṇi चौदह वर्ष
2. एकपदेन उत्तरत—
(क) रामः सीता लक्ष्मणश्च कुत्र स्थिताः आसन् ? Rāmaḥ Sītā Lakṣmaṇaśca kutra sthitāḥ āsan? राम, सीता और लक्ष्मण कहाँ रहते थे?
उत्तर: आश्रमे Āśrame आश्रम में
(ख) पितुः नियोगात् कः वनम् आगतः ? Pituḥ niyogāt kaḥ vanam āgataḥ? पिता की आज्ञा से कौन वन गया?
उत्तर: रामः Rāmaḥ राम
(ग) अन्यामपि वरं कः इच्छन् ? Anyāmapi varaṃ kaḥ icchan? दूसरा वर कौन चाहता था?
उत्तर: भरतः Bharataḥ भरत
(घ) पादोपभुक्ते चरणपादुके कः अयाचत ? Pādopabhukte caraṇapāduke kaḥ ayācat? राम की पादुका किसने माँगी?
उत्तर: भरतः Bharataḥ भरत
3. पूर्णवाक्येन उत्तरत—
(क) भोः तात! निवेदय निवेदनं कः उक्तवान् ? Bhoḥ tāta! nivedaya nivedanaṃ kaḥ uktavān? “हे तात! सूचना दीजिए” किसने कहा?
उत्तर: भरतः उक्तवान्। Bharataḥ uktavān. भरत ने कहा।
(ख) भरतः कस्याः पुत्रः आसीत् ? Bharataḥ kasyāḥ putraḥ āsīt? भरत किसका पुत्र था?
उत्तर: भरतः कैकेय्याः पुत्रः आसीत्। Bharataḥ Kaikeyyāḥ putraḥ āsīt. भरत कैकेयी का पुत्र था।
(ग) लक्ष्मणेन भरतस्य स्वागताय किम् अकथयत् ? Lakṣmaṇena Bharatasya svāgatāya kim akathayat? लक्ष्मण ने स्वागत में क्या कहा?
उत्तर: “एहि एहि इच्छकुमार! स्वागतम्” इति। “Ehi ehi icchakumāra! svāgatam”. “आओ कुमार! स्वागत है।”
(घ) सीताया: भरतं प्रति कः आशीषः आसीत् ? Sītāyāḥ Bharataṃ prati kaḥ āśīṣaḥ āsīt? सीता ने भरत को क्या आशीर्वाद दिया?
उत्तर: “चिरं जीव” इति। Ciraṃ jīva iti. दीर्घायु हो।
4. संस्कृतभाषायाम् अनुवादं कुरुत—
(क) दूसरा वर भी प्राप्त करना चाहता है। Dūsrā vara bhī prāpta karnā cāhtā hai. दूसरा वर चाहता है।
उत्तर: अन्यामपि वरं इच्छति। Anyāmapi varaṃ icchati. वह दूसरा वर भी चाहता है।
(ख) राम सीता व लक्ष्मण इस आश्रम में रहते हैं। Rām Sītā va Lakṣmaṇ is āśram meṃ rahte haiṃ. राम, सीता, लक्ष्मण आश्रम में रहते हैं।
उत्तर: रामः सीता लक्ष्मणश्च अस्मिन् आश्रमे वसन्ति। Rāmaḥ Sītā Lakṣmaṇaśca asmin āśrame vasanti. राम, सीता और लक्ष्मण इस आश्रम में रहते हैं।
(ग) भरत आ गये। Bharat ā gaye. भरत का आगमन।
उत्तर: भरतः आगतः। Bharataḥ āgataḥ. भरत आ गया।
(घ) मैं अनुगृहीत हुआ। Main anugṛhīt huā. मैं कृपा का पात्र बना।
उत्तर: अहं अनुगृहीतोऽस्मि। Ahaṃ anugṛhīto’smi. मैं अनुगृहीत हुआ हूँ।
5. प्रश्ननिर्माणं कुरुत—
आश्रमे एव रामः सीता लक्ष्मणश्च स्थिताः। Āśrame eva Rāmaḥ Sītā Lakṣmaṇaśca sthitāḥ. राम, सीता और लक्ष्मण आश्रम में ही हैं।
प्रश्न: रामः सीता लक्ष्मणश्च कुत्र स्थिताः? Rāmaḥ Sītā Lakṣmaṇaśca kutra sthitāḥ? राम, सीता और लक्ष्मण कहाँ स्थित हैं?
6. सन्धिं कृत्वा लिखत—
अयम् + अस्मि = अयमस्मि Ayamasmi मैं यही हूँ सु + आगतम् = स्वागतम् Svāgatam स्वागत अथ + इदानीम् = अथेदानीम् Athedānīm अब अभिषेक + उदकम् = अभिषेकोदकम् Abhiṣekodakam अभिषेक का जल
7. वाक्यरचना कुरुत—
अनुगृहित Anugṛhita कृपा प्राप्त
वाक्य: अहं रामेण अनुगृहितः। Ahaṃ Rāmeṇa anugṛhitaḥ. मैं राम द्वारा अनुगृहीत हुआ।
स्वागतम् Svāgatam स्वागत
वाक्य: भरताय स्वागतम्। Bharatāya svāgatam. भरत का स्वागत है।
वरम् Varam वर
वाक्य: भरतः वरं अयाचत्। Bharataḥ varaṃ ayācat. भरत ने वर माँगा।
अन्यामपि Anyāmapi दूसरा भी
वाक्य: भरतः अन्यामपि इच्छति। Bharataḥ anyāmapi icchati. भरत दूसरा भी चाहता है।

पाठसार / Moral

यह पाठ भ्रातृप्रेम, त्याग, कर्तव्य और आदर्श शासन का सन्देश देता है। भरत का राज्यत्याग और राम की मर्यादा आदर्श जीवन-मूल्यों का उदाहरण है। सच्चा धर्म अहंकार नहीं, सेवा और विनय में निहित होता है।

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