Lesson: 15 – Gitavachanamritani – Class : 8

यह पाठ भगवद्गीता के अमृतमय उपदेशों को प्रस्तुत करता है, जिसमें ईश्वर की सर्वव्यापकता, अविनाशी आत्मा और कर्मयोग का संदेश दिया गया है। जब-जब धर्म की हानि होती है, तब ईश्वर धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेते हैं। आत्मा न कभी नष्ट होती है और न ही किसी भौतिक तत्व से प्रभावित होती है, केवल शरीर बदलता है। मनुष्य को सुख-दुःख और जय-पराजय को समान समझकर अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। फल की आसक्ति त्यागकर निष्काम कर्म करना ही जीवन का श्रेष्ठ मार्ग है।

Path – Gitavachanamritani

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त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः। tvam | ā-di | de-vaḥ | pu-ru-ṣaḥ | pu-rā-ṇaḥ आप आदिदेव हैं, शाश्वत और प्राचीन पुरुष हैं।
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। tvam | a-sya | vi-śva-sya | pa-ram | ni-dhā-nam आप इस पूरे विश्व का परम आधार हैं।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम। vet-tā | a-si | ved-yam | cha | pa-ram | cha | dhā-ma आप जानने वाले भी हैं और जानने योग्य भी तथा परम धाम हैं।
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥1॥ tva-yā | ta-tam | vi-śvam | a-nan-ta-rū-pa हे अनन्त रूप वाले! आपके द्वारा सारा विश्व व्याप्त है।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। ya-dā | ya-dā | hi | dhar-ma-sya | glā-niḥ | bha-va-ti | bhā-ra-ta हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥2॥ a-bhyut-thā-nam | a-dhar-ma-sya | ta-dā | āt-mā-nam | sṛ-jā-mi | a-ham और अधर्म की वृद्धि होने पर मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। pa-ri-trā-ṇā-ya | sā-dhū-nām | vi-nā-śā-ya | cha | duṣ-kṛ-tām साधुओं की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥3॥ dhar-ma | san-sthā-pa-na | ar-thā-ya | sam-bha-vā-mi | yu-ge | yu-ge मैं हर युग में धर्म की स्थापना के लिए जन्म लेता हूँ।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। su-kha | duḥ-khe | sa-me | kṛ-tv-ā | lā-bhā-lā-bhau | ja-yā-ja-yau सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान मानकर।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥4॥ ta-to | yud-dhā-ya | yu-jya-sva | nai-vam | pā-pam | a-vāp-sya-si तब युद्ध के लिए तैयार हो जाओ, इससे पाप नहीं मिलेगा।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। vā-sān-si | jīr-ṇā-ni | ya-thā | vi-hā-ya | na-vā-ni | gṛh-ṇā-ti | na-raḥ | a-pa-rā-ṇi जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण करता है।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यानि संयाति नवानि देही ॥5॥ ta-thā | śa-rī-rā-ṇi | vi-hā-ya | jīr-ṇā-ni | a-nyā-ni | sam-yā-ti | na-vā-ni | de-hī वैसे ही आत्मा पुराने शरीर छोड़कर नए शरीर ग्रहण करती है।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। na | e-nam | chin-dan-ti | śas-trā-ṇi | na | e-nam | da-ha-ti | pā-va-kaḥ इस आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥6॥ na | cha | e-nam | kle-da-yan-ti | ā-paḥ | na | śo-ṣa-ya-ti | mā-ru-taḥ न जल भिगो सकता है और न वायु सुखा सकती है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। kar-ma-ṇi | e-va | a-dhi-kā-raḥ | te | mā | pha-le-ṣu | ka-dā-cha-na तुम्हारा अधिकार केवल कर्म में है, फल में नहीं।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥7॥ mā | kar-ma | pha-la | he-tuḥ | bhūḥ | mā | te | saṅ-gaḥ | a-stu | a-kar-ma-ṇi फल की आसक्ति मत रखो और अकर्म में भी मत उलझो।
शब्दार्थ
SanskritPronunciationHindi Meaning
आदिदेवःā-di-de-vaḥप्रथम देव
पुराणःpu-rā-ṇaḥशाश्वत
निधानम्ni-dhā-namआधार
वेत्ताvet-tāजानकार
वेद्यम्ved-yamजानने योग्य
ग्लानिःglā-niḥहानि
अभ्युत्थानम्a-bhyut-thā-namवृद्धि
आत्मानम्āt-mā-namस्वयं को
सृजामिsṛ-jā-miप्रकट करता हूँ
परित्राणायpa-ri-trā-ṇā-yaरक्षा हेतु
दुष्कृताम्duṣ-kṛ-tāmपापी
संस्थापनार्थायsan-sthā-pa-na-ar-thā-yaस्थापना हेतु
सम्भवामिsam-bha-vā-miजन्म लेता हूँ
युज्यस्वyu-jya-svaतैयार हो
वासांसिvā-sān-siवस्त्र
जीर्णानिjīr-ṇā-niपुराने
देहीde-hīआत्मा
शस्त्राणिśas-trā-ṇiहथियार
पावकःpā-va-kaḥअग्नि
आपःā-paḥजल
मारुतःmā-ru-taḥवायु
अधिकारःa-dhi-kā-raḥअधिकार
सङ्गःsaṅ-gaḥआसक्ति
अकर्मणिa-kar-ma-ṇiनिष्क्रियता
अवाप्स्यसिa-vāp-sya-siप्राप्त करोगे
अन्वयः
हे अनन्तरूप! त्वं आदिदेवः, पुराणः पुरुषः (असि)। he a-nan-ta-rū-pa | tvam ā-di-de-vaḥ | pu-rā-ṇaḥ | pu-ru-ṣaḥ (a-si) हे अनन्त रूप वाले! आप आदिदेव, शाश्वत और प्राचीन पुरुष हैं।
त्वम् अस्य विश्वस्य परं निधानम् (असि)। tvam a-sya vi-śva-sya | pa-ram ni-dhā-nam (a-si) आप इस समस्त विश्व के परम आधार हैं।
त्वं वेत्ता वेद्यं च (असि)। tvam vet-tā | ved-yam cha (a-si) आप जानने वाले भी हैं और जानने योग्य भी हैं।
त्वं परं धाम (असि)। tvam pa-ram dhā-ma (a-si) आप ही परम धाम हैं।
(हे अनन्तरूप!) त्वया विश्वं च ततम्। (he a-nan-ta-rū-pa) | tva-yā vi-śvam cha ta-tam हे अनन्त रूप वाले! आपके द्वारा सारा विश्व व्याप्त है।
हे भारत! यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः (भवति), he bhā-ra-ta | ya-dā ya-dā hi | dhar-ma-sya glā-niḥ (bha-va-ti) हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है,
अधर्मस्य अभ्युत्थानं भवति तदा अहं आत्मानं सृजामि। a-dhar-ma-sya a-bhyut-thā-nam bha-va-ti | ta-dā a-ham āt-mā-nam sṛ-jā-mi और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
(अहं) युगे युगे साधूनां परित्राणाय, (a-ham) yu-ge yu-ge | sā-dhū-nām pa-ri-trā-ṇā-ya मैं हर युग में साधुओं की रक्षा के लिए,
दुष्कृतां विनाशाय, duṣ-kṛ-tām vi-nā-śā-ya दुष्टों के विनाश के लिए,
धर्मसंस्थापनार्थाय च सम्भवामि। dhar-ma san-sthā-pa-na ar-thā-ya cha sam-bha-vā-mi और धर्म की स्थापना के लिए जन्म लेता हूँ।
लाभालाभौ, जयाजयौ, सुखदुःखे समे कृत्वा lā-bhā-lā-bhau | ja-yā-ja-yau | su-kha duḥ-khe sa-me kṛ-tv-ā लाभ-हानि, जय-पराजय तथा सुख-दुःख को समान मानकर
ततः युद्धाय युज्यस्व। ta-taḥ yud-dhā-ya yu-jya-sva तब युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।
एवं पापं न अवाप्स्यसि। e-vam pā-pam na a-vāp-sya-si इस प्रकार तुम्हें पाप प्राप्त नहीं होगा।
यथा नरः जीर्णानि वासांसि विहाय अपराणि नवानि (वासांसि) गृह्णाति, ya-thā na-raḥ | jīr-ṇā-ni vā-sān-si vi-hā-ya | a-pa-rā-ṇi na-vā-ni (vā-sān-si) gṛh-ṇā-ti जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण करता है,
तथा देही जीर्णानि शरीराणि विहाय नवानि (शरीराणि) संयाति। ta-thā de-hī | jīr-ṇā-ni śa-rī-rā-ṇi vi-hā-ya | na-vā-ni (śa-rī-rā-ṇi) sam-yā-ti वैसे ही आत्मा पुराने शरीर छोड़कर नए शरीर प्राप्त करती है।
शस्त्राणि एनं न छिन्दन्ति, śas-trā-ṇi e-nam na chin-dan-ti शस्त्र इस आत्मा को काट नहीं सकते,
पावकः एनं न दहति, pā-va-kaḥ e-nam na da-ha-ti अग्नि इसे जला नहीं सकती,
आपः एनं न क्लेदयन्ति, ā-paḥ e-nam na kle-da-yan-ti जल इसे भिगो नहीं सकता,
मारुतः एनं न शोषयति। mā-ru-taḥ e-nam na śo-ṣa-ya-ti और वायु इसे सुखा नहीं सकती।
कर्मणि एव ते अधिकारः, फलेषु कदाचन मा। kar-ma-ṇi e-va te a-dhi-kā-raḥ | pha-le-ṣu ka-dā-cha-na mā तुम्हारा अधिकार केवल कर्म में है, फल में कभी नहीं।
त्वं कर्मफलहेतुः मा भूः। tvam kar-ma pha-la he-tuḥ mā bhūḥ कर्म के फल का कारण बनने की इच्छा मत रखो।
अकर्मणि ते सङ्गः अपि मा अस्तु। a-kar-ma-ṇi te saṅ-gaḥ a-pi mā a-stu और अकर्म (कर्तव्य से पलायन) में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।
अभ्यास
1. उच्चारणं कृत्वा पुस्तिकायां च लिखत –
पुरुषः, वेत्तासि, विश्वमनन्तरूप, सङ्गोऽस्त्वकर्मणि, अभ्युत्थानमधर्मस्य, सृजाम्यहम्, धर्मसंस्थापनार्थाय, कर्मफलहेतुर्भूः pu-ru-ṣaḥ, vet-tā-si, vi-śva-man-an-ta-rū-pa, saṅ-go’stu a-kar-ma-ṇi, a-bhyut-thā-nam a-dhar-ma-sya, sṛ-jā-mi a-ham, dhar-ma-san-sthā-pa-na-ar-thā-ya, kar-ma-pha-la-he-tu-bhūḥ इन शब्दों का सही उच्चारण करके कॉपी में लिखो।
2. एकपदेन उत्तरत –
(क) पुराणः पुरुषः कः ? (ka) pu-rā-ṇaḥ pu-ru-ṣaḥ kaḥ प्राचीन पुरुष कौन है?
उत्तर: ईश्वरः। ī-śva-raḥ ईश्वर।
(ख) अस्माकं कुत्र अधिकारः अस्ति ? (kha) a-smā-kam ku-tra a-dhi-kā-raḥ a-sti हमारा अधिकार कहाँ है?
उत्तर: कर्मणि। kar-ma-ṇi कर्म में।
(ग) केषां परित्राणाय ईश्वरः सम्भवति ? (ga) ke-ṣām pa-ri-trā-ṇā-ya ī-śva-raḥ sam-bha-va-ti ईश्वर किनकी रक्षा के लिए जन्म लेते हैं?
उत्तर: साधूनाम्। sā-dhū-nām साधुओं की।
(घ) शस्त्राणि कं न छिन्दन्ति ? (gha) śas-trā-ṇi kam na chin-dan-ti शस्त्र किसे नहीं काट सकते?
उत्तर: आत्मानम्। āt-mā-nam आत्मा को।
3. पूर्णवाक्येन उत्तरत –
(क) परमात्मा आत्मानं कदा सृजति ? (ka) pa-ra-māt-mā āt-mā-nam ka-dā sṛ-ja-ti परमात्मा स्वयं को कब प्रकट करते हैं?
उत्तर: यदा धर्मस्य ग्लानिः भवति तदा आत्मानं सृजति। ya-dā dhar-ma-sya glā-niḥ bha-va-ti ta-dā āt-mā-nam sṛ-ja-ti जब धर्म की हानि होती है तब परमात्मा प्रकट होते हैं।
(ख) कं आपः न क्लेदयन्ति ? (kha) kam ā-paḥ na kle-da-yan-ti जल किसे नहीं भिगोता?
उत्तर: आत्मानम्। āt-mā-nam आत्मा को।
(ग) जीर्णानि शरीराणि विहाय कः संयाति ? (ga) jīr-ṇā-ni śa-rī-rā-ṇi vi-hā-ya kaḥ sam-yā-ti पुराने शरीर छोड़कर कौन जाता है?
उत्तर: देही संयाति। de-hī sam-yā-ti आत्मा जाती है।
(घ) पावकः कं न दहति ? (gha) pā-va-kaḥ kam na da-ha-ti अग्नि किसे नहीं जलाती?
उत्तर: आत्मानम्। āt-mā-nam आत्मा को।
4. सन्धि-विच्छेदः –
उत्तर: नरः + अपराणि = नरोऽपराणि — विसर्गसन्धिः na-raḥ + a-pa-rā-ṇi = na-ro’pa-rā-ṇi विसर्ग सन्धि
उत्तर: वेत्ता + असि = वेत्तासि — सवर्णदीर्घ सन्धिः vet-tā + a-si = vet-tā-si सवर्ण दीर्घ सन्धि
उत्तर: कर्मणि + एव = कर्मण्येव — यण् सन्धिः kar-ma-ṇi + e-va = kar-ma-ṇye-va यण् सन्धि
उत्तर: ग्लानिः + भवति = ग्लानिर्भवति — विसर्ग सन्धिः glā-niḥ + bha-va-ti = glā-nir-bha-va-ti विसर्ग सन्धि
उत्तर: सृजामि + अहम् = सृजाम्यहम् — यण् सन्धिः sṛ-jā-mi + a-ham = sṛ-jām-ya-ham यण् सन्धि
5. शब्द–विभक्ति–वचनम्
साधूनाम् — साधु, षष्ठी, बहुवचनम्
धर्मस्य — धर्म, षष्ठी, एकवचनम्
फलेषु — फल, सप्तमी, बहुवचनम्
आत्मानम् — आत्मन्, द्वितीया, एकवचनम्
शरीराणि — शरीर, प्रथमा, बहुवचनम्
6. विशेषण–विशेष्य योगः
पुरुषः — परः
शरीराणि — पुराणि
निधानम् — जीर्णम्
7. संस्कृत अनुवादः
(क) आपः एनं न क्लेदयन्ति। ā-paḥ e-nam na kle-da-yan-ti जल इसको गीला नहीं करता।
(ख) धर्मसंस्थापनार्थाय अहं सम्भवामि। dhar-ma-san-sthā-pa-na-ar-thā-ya a-ham sam-bha-vā-mi धर्म की स्थापना के लिए मैं जन्म लेता हूँ।
(ग) सुखदुःखे समे कृत्वा युद्धाय युज्यस्व। su-kha duḥ-khe sa-me kṛ-tv-ā yud-dhā-ya yu-jya-sva सुख-दुःख को समान मानकर युद्ध के लिए तैयार हो।
शिक्षण-सङ्केतः
सर्वेषां श्लोकानां सस्वरवाचनं कार्यत। sar-ve-ṣām ślo-kā-nām sa-sva-ra-vā-ca-nam kā-rya-tam सभी श्लोकों का सही स्वर के साथ पाठ कराया जाए।
कृष्णार्जुनसंवादस्य प्रसङ्गः संक्षेपेण श्राव्यत। kṛṣ-ṇār-ju-na-san-vā-da-sya pra-saṅ-gaḥ san-kṣe-pe-ṇa śrā-vya-tām कृष्ण-अर्जुन संवाद का प्रसंग संक्षेप में सुनाया जाए।
प्रत्येक श्लोक का नैतिक संदेश (Moral)
श्लोक 1 śloka eka ईश्वर ही सृष्टि का मूल आधार हैं। सम्पूर्ण संसार उन्हीं में स्थित है और वही सर्वोच्च सत्य हैं।
श्लोक 2 śloka dvi जब-जब धर्म की हानि होती है, तब ईश्वर स्वयं अवतार लेकर संसार में संतुलन स्थापित करते हैं।
श्लोक 3 śloka tri ईश्वर का अवतार साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए होता है।
श्लोक 4 śloka catvāri मनुष्य को सुख-दुःख और जय-पराजय को समान मानकर कर्तव्य करना चाहिए, तभी वह पाप से बच सकता है।
श्लोक 5 śloka pañca आत्मा अमर है, केवल शरीर बदलता है। मृत्यु शरीर की होती है, आत्मा की नहीं।
श्लोक 6 śloka ṣaṭ आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है; वह अविनाशी और अजर-अमर है।
श्लोक 7 śloka sapta मनुष्य को फल की इच्छा छो़ड़कर केवल कर्म करना चाहिए और अकर्म (कर्तव्य से पलायन) से दूर रहना चाहिए।

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