बंद होते स्कूल और टूटते सपने: बच्चों की शिक्षा से दूर होती दूरी

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पास का स्कूल अब दूर हो गया…

लेखक: एक शिक्षक की कलम से

“पहले स्कूल घर के पास था, अब स्कूल दूर हो गया है — और बच्चों के सपने भी।”

गाँव के वो छोटे-छोटे स्कूल, जो हर टोले-मुहल्ले के करीब बने थे, आज अचानक “कम संख्या” के आधार पर बंद हो रहे हैं। बच्चों को अब दूसरे स्कूल में “शिफ्ट” किया जा रहा है, जो कई किलोमीटर दूर है। यह फैसला सिर्फ दूरी नहीं बढ़ा रहा, बल्कि शिक्षा से बच्चों की नज़दीकी को खत्म कर रहा है।

पहले क्यों पास-पास खोले गए थे स्कूल?

  • हर बच्चे को मूलभूत शिक्षा का अधिकार है।
  • गाँवों में भौगोलिक दूरी और संसाधनों की कमी होती है।
  • छोटे बच्चों को स्कूल पहुँचाना आसान हो, इसलिए पास खोले गए।
  • लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए यह ज़रूरी था।

अब क्या हो रहा है?

नीति के तहत, जिन स्कूलों में 50 से कम छात्र हैं, उन्हें पास के दूसरे स्कूल में मिला दिया जा रहा है। इससे:

  • बच्चों को अब दूर जाना होगा।
  • छोटे बच्चों के लिए यह असुरक्षित और मुश्किल हो सकता है।
  • लड़कियों की शिक्षा सबसे पहले प्रभावित होगी।
  • स्थानीय टीचर हटाए जा सकते हैं, जिससे बच्चों का मन टूटेगा।

बढ़ती दूरी, घटता हौसला

6 साल की गुड़िया अब स्कूल नहीं जा रही। उसकी माँ कहती हैं,

“चार किलोमीटर दूर कैसे जाएगी वो? न कोई सवारी है, न रास्ता ठीक।”

राहुल, जो तीसरी कक्षा में पढ़ता था, अब अपने पापा के साथ खेत पर जाने लगा है। उसका स्कूल अब इतनी दूर है कि अकेले जा ही नहीं सकता।

क्या होगा अब…?

  • बच्चों की पढ़ाई छूटेगी।
  • बालिका शिक्षा पर बुरा असर पड़ेगा।
  • यातायात सुविधा नहीं, तो शिक्षा से दूरी तय।
  • बच्चों और स्कूल का भावनात्मक रिश्ता टूटेगा।

एक सवाल जो हर माता-पिता पूछ रहे हैं:

“पहले आपने स्कूल खोले थे ताकि बच्चा पढ़े, अब वही स्कूल बंद क्यों कर रहे हैं?”

समाधान क्या हो सकता है?

  • स्थानीय स्तर पर सामूहिक समाधान निकाले जाएँ।
  • अभिभावकों से संवाद और चर्चा की जाए।
  • छात्रों की सुरक्षा और सुविधा को प्राथमिकता दी जाए।

अंत में…

स्कूल के बंद दरवाज़े सिर्फ ईंटें नहीं रोकते, वो सपनों को रोकते हैं…

आज ज़रूरत है कि हम सब मिलकर बच्चों की तरफ से आवाज़ उठाएँ। शिक्षा का अधिकार सिर्फ कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर भी होना चाहिए।

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