Lesson : 13 – Veerabhimanyuh – Class : 8

यह पाठ ‘वीराभिमन्युः’ महाभारत के महान् योद्धा अभिमन्यु के अद्भुत शौर्य और बलिदान का वर्णन करता है।
महाभारत का युद्ध अठारह दिनों तक चला, जिसमें विभिन्न दिनों में भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण और शल्य सेनापति बने।
द्रोणाचार्य द्वारा रचित चक्रव्यूह में अर्जुन की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर अभिमन्यु अकेले ही प्रवेश करता है।
अत्यन्त वीरता से युद्ध करते हुए वह अनेक शत्रुओं को पराजित करता है, परन्तु सात महारथियों द्वारा अन्यायपूर्वक मारा जाता है।
अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त करता है और उसका त्याग, साहस एवं कर्तव्यनिष्ठा उसे अमर बना देते हैं।

Path – Veerabhimanyuh

त्रयोदशः पाठः Trayodaśaḥ pāṭhaḥ तेरहवाँ पाठ
वीराभिमन्युः Vīrābhimanyuḥ वीर अभिमन्यु
महाभारतस्य युद्धम् अष्टादश दिनानि यावत् प्रावर्तत। Mahābhāratasya yuddham aṣṭādaśa dināni yāvat prāvartata महाभारत का युद्ध अठारह दिनों तक चला।
आदौ कौरवक्षेत्रे पितामहः भीष्मः सेनापतिः अभवत्। Ādau kauravakṣetre pitāmahaḥ bhīṣmaḥ senāpatiḥ abhavat आरम्भ में कौरवों की सेना के सेनापति पितामह भीष्म थे।
दश दिनानि स युद्धम् अकरोत्। Daśa dināni sa yuddham akarot उन्होंने दस दिनों तक युद्ध किया।
ततः एकादशे दिने द्रोणाचार्यः सेनापतिः अभवत्। Tataḥ ekādaśe dine droṇācāryaḥ senāpatiḥ abhavat फिर ग्यारहवें दिन द्रोणाचार्य सेनापति बने।
स पञ्च दिनानि सेनापतिः अभवत्। Sa pañca dināni senāpatiḥ abhavat वे पाँच दिनों तक सेनापति रहे।
पञ्चदशे दिवसे स वीराभिमन्युम् अपातयत्। Pañcadaśe divase sa vīrābhimanyum apātayat पंद्रहवें दिन उसने वीर अभिमन्यु को गिरा दिया।
तदनन्तरं कर्णः षोडशपर्यन्तं सेनापतिः अभवत्। Tadanantaraṁ karṇaḥ ṣoḍaśaparyantaṁ senāpatiḥ abhavat उसके बाद कर्ण सोलहवें दिन तक सेनापति रहा।
तस्मिन् वीरगते प्राप्ते अष्टे दिने मूलं शल्यः युद्धे कृतवान्। Tasmin vīragate prāpte aṣṭe dine mūlaṁ śalyaḥ yuddhe kṛtavān वीरों के मारे जाने के बाद आठवें दिन शल्य ने युद्ध किया।
षष्ठे दिवसार्धे भीमः दुर्योधनः गदायुद्धे अभवत्। Ṣaṣṭhe divasārdhe bhīmaḥ duryodhanaḥ gadāyuddhe abhavat छठे दिन के आधे भाग में भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध हुआ।
अन्ते शल्यस्य पराजये महायुद्धस्य समाप्तिः अभवत्। Ante śalyasya parājaye mahāyuddhasya samāptiḥ abhavat अंत में शल्य की हार से महायुद्ध समाप्त हुआ।
षोडशे दिने कौरवक्षेत्रे सेनापतिः आसीत् द्रोणाचार्यः। Ṣoḍaśe dine kauravakṣetre senāpatiḥ āsīt droṇācāryaḥ सोलहवें दिन कौरव सेना के सेनापति द्रोणाचार्य थे।
चक्रव्यूहस्य रचयिता सः आसीत्। Cakravyūhasya racayitā saḥ āsīt वह चक्रव्यूह के रचयिता थे।
तदा चक्रव्यूहः अर्जुनः युद्धे कदाचित् सन्निहितः न भवति। Tadā cakravyūhaḥ arjunaḥ yuddhe kadācit sannihitaḥ na bhavati उस समय अर्जुन युद्ध में उपस्थित नहीं था।
तदा तं जेतुं भवेत्। Tadā taṁ jetuṁ bhavet तब उसे जीतना संभव होगा।
इति श्रुत्वा दुर्योधनः परीक्षां संकल्पनम् अकरोत्। Iti śrutvā duryodhanaḥ parīkṣāṁ saṅkalpanam akarot यह सुनकर दुर्योधन ने योजना बनाई।
अर्जुनः युद्धाय अन्यत्र दूरं नीतः। Arjunaḥ yuddhāya anyatra dūraṁ nītaḥ अर्जुन को युद्ध के लिए दूर भेज दिया गया।
‘अद्य एव अवसरः’ इति मत्वा द्रोणाचार्यः चक्रव्यूहं रचयित्वा, Adya eva avasaraḥ iti matvā droṇācāryaḥ cakravyūhaṁ racayitvā आज ही अवसर है, ऐसा सोचकर द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह रचा।
तस्य भेदनं पाण्डवपक्षे कश्चित् अर्जुनाद् अन्यः न अजानात्। Tasya bhedanaṁ pāṇḍavapakṣe kaścit arjunāt anyaḥ na ajānāt पाण्डव पक्ष में अर्जुन के अतिरिक्त कोई भी उसका भेदन नहीं जानता था।
महाराजः युधिष्ठिरः यत्र–तत्र उदीक्ष्य स्थितवान्। Mahārājaḥ yudhiṣṭhiraḥ yatra-tatra udīkṣya sthitavān महाराज युधिष्ठिर इधर-उधर देखते हुए खड़े थे।
तदानीं अर्जुनः अन्यत्र युद्धे संलग्नः आसीत्। Tadānīṁ arjunaḥ anyatra yuddhe saṅlagnaḥ āsīt उस समय अर्जुन अन्यत्र युद्ध में लगा था।
अभिमन्युः एकाकी चक्रव्यूहमध्ये प्रविश्य अतिवीरतया युद्धं कृत्वा बहून् वीरान् हतवान्। Abhimanyuḥ ekākī cakravyūhamadhye praviśya ativīratayā yuddhaṁ kṛtvā bahūn vīrān hatavān अभिमन्यु अकेला चक्रव्यूह में घुसकर अत्यंत वीरता से युद्ध कर अनेक वीरों को मार गिराया।
हा धिक्! Hā dhik! हाय! धिक्कार है!
अन्ते द्रोणः, कृपः, कर्णः, अश्वत्थामा, दुःशासनः, जयद्रथः सप्त योद्धारः सम्मिल्य अभिमन्युम् नि:शस्त्रं कृत्वा एकाकिनं हतवन्तः। Ante droṇaḥ, kṛpaḥ, karṇaḥ, aśvatthāmā, duḥśāsanaḥ, jayadrathaḥ sapta yoddhāraḥ sammiljya abhimanyum niḥśastraṁ kṛtvā ekākinam hatavantaḥ अंत में सात योद्धाओं ने मिलकर निहत्थे और अकेले अभिमन्यु का वध किया।
अभिमन्युः वीरगतिं लब्धवान्। Abhimanyuḥ vīragatiṁ labdhavān अभिमन्यु ने वीरगति प्राप्त की।
अमरः अभवत्। Amaraḥ abhavat वह अमर हो गया।
शब्दार्थः
SanskritPronunciationHindi Meaning
महाभारतम्Mahābhāratamमहाभारत
युद्धम्Yuddhamयुद्ध
अष्टादशAṣṭādaśaअठारह
सेनापतिःSenāpatiḥसेनाध्यक्ष
पितामहःPitāmahaḥदादा
प्रावर्ततPrāvartataचल पड़ा
एकाकीEkākīअकेला
चक्रव्यूहःCakravyūhaḥविशेष युद्ध रचना
रचयिताRacayitāनिर्माता
हतवान्Hatavānमार दिया
वीरगतिःVīragatiḥवीर मृत्यु
अमरःAmaraḥअमर
सन्निहितःSannihitaḥउपस्थित
अवसरःAvasaraḥमौका
पराजयःParājayaḥहार
समाप्तिःSamāptiḥसमाप्ति
एकाकिनम्Ekākinamअकेले को
योद्धारःYoddhāraḥयोद्धा
सम्मिल्यSammilyaमिलकर
नि:शस्त्रम्Niḥśastramनिहत्था
अतिवीरतयाAtivīratayāअत्यधिक वीरता से
प्रविश्यPraviśyaप्रवेश करके
संलग्नःSaṁlagnaḥलगा हुआ
उदीक्ष्यUdīkṣyaदेखते हुए
संकल्पनम्Saṅkalpanamयोजना
अभ्यासः (प्रश्न 1–7)
प्रश्न 1
उच्चारणं कृत्वा पुस्तिकायां च लिखत—
युद्धे भीष्मः दिनदशपर्यन्तम्।
Uccāraṇaṁ kṛtvā pustikāyāṁ ca likhata — yuddhe bhīṣmaḥ dinadaśaparyantam उच्चारण करके कॉपी में लिखिए — युद्ध में भीष्म दस दिनों तक रहे।
उत्तर: युद्धे भीष्मः दिनदशपर्यन्तम्। Yuddhe bhīṣmaḥ dinadaśaparyantam युद्ध में भीष्म दस दिनों तक रहे।
प्रश्न 2(क)
कौरवक्षेत्रे कः प्रथमः सेनापतिः अभवत् ? Kauravakṣetre kaḥ prathamaḥ senāpatiḥ abhavat? कौरवों की सेना में पहला सेनापति कौन था?
उत्तर: कौरवक्षेत्रे पितामहः भीष्मः प्रथमः सेनापतिः अभवत्। Kauravakṣetre pitāmahaḥ bhīṣmaḥ prathamaḥ senāpatiḥ abhavat कौरव सेना में पितामह भीष्म पहले सेनापति थे।
प्रश्न 2(ख)
द्रोणाचार्यः कति दिनानि सेनापतिः आसीत् ? Droṇācāryaḥ kati dināni senāpatiḥ āsīt? द्रोणाचार्य कितने दिनों तक सेनापति रहे?
उत्तर: द्रोणाचार्यः पञ्च दिनानि सेनापतिः आसीत्। Droṇācāryaḥ pañca dināni senāpatiḥ āsīt द्रोणाचार्य पाँच दिनों तक सेनापति रहे।
प्रश्न 2(ग)
एकादशे दिवसे कः सेनापतिः अभवत् ? Ekādaśe divase kaḥ senāpatiḥ abhavat? ग्यारहवें दिन कौन सेनापति बना?
उत्तर: एकादशे दिवसे द्रोणाचार्यः सेनापतिः अभवत्। Ekādaśe divase droṇācāryaḥ senāpatiḥ abhavat ग्यारहवें दिन द्रोणाचार्य सेनापति बने।
प्रश्न 2(घ)
अर्जुनं विहाय चक्रव्यूह-भेदन-विधिं कः अजानात् ? Arjunaṁ vihāya cakravyūha-bhedana-vidhiṁ kaḥ ajānāt? अर्जुन को छोड़कर चक्रव्यूह भेदन की विधि कौन नहीं जानता था?
उत्तर: अर्जुनं विहाय पाण्डवपक्षे अन्यः कश्चित् चक्रव्यूह-भेदन-विधिं न अजानात्। Arjunaṁ vihāya pāṇḍavapakṣe anyaḥ kaścit cakravyūha-bhedana-vidhiṁ na ajānāt अर्जुन के अलावा पांडव पक्ष में कोई भी चक्रव्यूह भेदन नहीं जानता था।
प्रश्न 3
महाभारतस्य युद्धं कति दिनानि यावत् प्रावर्तत ? Mahābhāratasya yuddhaṁ kati dināni yāvat prāvartata? महाभारत का युद्ध कितने दिनों तक चला?
उत्तर: महाभारतस्य युद्धम् अष्टादश दिनानि यावत् प्रावर्तत। Mahābhāratasya yuddham aṣṭādaśa dināni yāvat prāvartata महाभारत का युद्ध अठारह दिनों तक चला।
प्रश्न 4
अधोलिखित-पदानां विभक्ति-वचनं लिखत। Adholikhita-padānāṁ vibhakti-vacanaṁ likhata नीचे लिखे शब्दों की विभक्ति और वचन लिखिए।
उत्तर: ऐतिहासिकस्य — षष्ठी — एकवचनम्
विजयाय — चतुर्थी — एकवचनम्
स्वपितुः — षष्ठी — एकवचनम्
पराक्रमेन — तृतीया — एकवचनम्
aitihāsikasya, vijayāya, svapituḥ, parākramena ऐतिहासिक का, विजय के लिए, अपने पिता का, पराक्रम से
प्रश्न 5
अधोलिखितपदानि समानार्थकैः पदैः योजयत। Adholikhita-padāni samānārthakaiḥ padaiḥ yojayata नीचे लिखे शब्दों को समानार्थक शब्दों से मिलाइए।
उत्तर: युद्धम् — समरः
दिनानि — दिवसाः
सेनापतिः — चमुपतिः
एकाकी — एकलः
हतवान् — मारितवान्
Yuddham–samaraḥ, dināni–divasāḥ, senāpatiḥ–camupatiḥ, ekākī–ekalaḥ, hatavān–māritavān युद्ध, दिन, सेनापति, अकेला, मारा हुआ
प्रश्न 6
अधोलिखितवाक्यानि संशोधयत। Adholikhita-vākyāni saṁśodhayata नीचे दिए वाक्यों को शुद्ध कीजिए।
उत्तर: (क) द्रोणाचार्यः सेनापतिः आसीत्।
(ख) सः पञ्च दिनानि सेनापतिः आसीत्।
(ग) सः वीरगतिं प्राप्तवान्।
(घ) दुर्योधनः स्वविजये द्रोणाचार्यं प्रार्थितवान्।
(ङ) अभिमन्युः वीरगतिं लब्धवान्।
वाक्य शुद्ध रूप में लिखे गए।
प्रश्न 7
संस्कृतभाषायाम् अनुवादं कुरुत। Saṁskṛta-bhāṣāyām anuvādaṁ kuruta संस्कृत भाषा में अनुवाद कीजिए।
उत्तर: (क) वीरः अभिमन्युः अर्जुनस्य पुत्रः आसीत्।
(ख) सः एकाकी सप्त महारथिभिः सह अलभत्।
(ग) जयद्रथः अन्यायेन अभिमन्युं हतवान्।
(घ) अतः अर्जुनः जयद्रथवधे प्रतिज्ञां कृतवान्।
अभिमन्यु अर्जुन का पुत्र था, वह अकेला सात महारथियों से लड़ा, जयद्रथ ने अन्याय से उसे मारा, इसलिए अर्जुन ने प्रतिज्ञा की।

स्मरणीयम् (अर्थ सहित)

धीरः भव — धैर्यवान बनो।
वीरः भव — साहसी बनो।
शिष्टः भव — विनम्र बनो।
सत्यः भव — सत्यवादी बनो।
हीन-जने मानं कुरु — निर्बल का सम्मान करो।
दीन-जने दानं कुरु — गरीब को दान दो।

स्मरणीयम्

धीर बनो, वीर बनो। शिष्ट और सत्यवादी बनो। हर्षित रहो, स्वस्थ बनो। स्वच्छता, ध्यान और मधुर जल का सेवन करो। पढ़ाई में ध्यान दो, दीन और हीन जनों का सम्मान करो। सबके साथ समान व्यवहार करो।

Moral / नैतिक शिक्षा

यह पाठ हमें सिखाता है कि सच्ची वीरता, साहस और कर्तव्यनिष्ठा ही मनुष्य को अमर बनाती है। अभिमन्यु ने अकेले होकर भी अन्याय के सामने हार नहीं मानी और धर्मपक्ष के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। हमें भी जीवन में सत्य, धर्म और साहस के मार्ग पर डटे रहना चाहिए, चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही कठिन क्यों न हों।

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