Path – Yaksha Yudhishthira Samvada
त्रयोदशः पाठः : यक्ष–युधिष्ठिर–संवादः
यक्ष उवाच
Yakṣa uvāca
यक्ष ने कहा।
भावार्थ: यक्ष प्रश्नों के माध्यम से जीवन-सत्य की परीक्षा आरम्भ करता है।
किंस्विद् गुरुतरं भूमेः किंस्विद् उदरं न खादति।
Kiṁsvid gurutaraṁ bhūmeḥ kiṁsvid udaraṁ na khādati.
पृथ्वी से भी अधिक भारी क्या है? किसका पेट कभी नहीं भरता?
भावार्थ: यक्ष भौतिक से परे नैतिक और मानवीय महानता के तत्व पूछता है।
किंस्विद् छिद्रं न वायोः किंस्विद् बहुदरं न गणयति॥1॥
Kiṁsvid chidraṁ na vāyoḥ kiṁsvid bahudaraṁ na gaṇayati.
वायु में छेद क्यों नहीं होता और कौन बहुत पेट वाला नहीं माना जाता?
भावार्थ: यक्ष प्रकृति और मनुष्य की इच्छाओं पर विचार करने को प्रेरित करता है।
युधिष्ठिर उवाच
Yudhiṣṭhira uvāca
युधिष्ठिर ने कहा।
भावार्थ: युधिष्ठिर विवेक और धर्म के आधार पर उत्तर देते हैं।
माता गुरुतरा भूमेः खादति पितृवत्सला।
Mātā gurutarā bhūmeḥ khādati pitṛvatsalā.
माता पृथ्वी से भी अधिक महान है और उसका पेट कभी नहीं भरता।
भावार्थ: माता का त्याग और ममता असीम होती है, वह सब सहन करती है।
मनः शीघ्रतरं वाताच्चिन्ता बहुदरी गण्यते॥2॥
Manaḥ śīghrataraṁ vātāt cintā bahudarī gaṇyate.
मन वायु से भी तेज है और चिंता बहुत पेट वाली मानी जाती है।
भावार्थ: मन की गति तीव्र है और चिंता कभी तृप्त नहीं होती।
यक्ष उवाच
Yakṣa uvāca
यक्ष ने कहा।
भावार्थ: यक्ष अब मानव के आंतरिक शत्रुओं पर प्रश्न करता है।
कः शत्रुर्जयः पुंसां कश्च व्याधिरनन्तकः।
Kaḥ śatrurjayaḥ puṁsāṁ kaśca vyādhiranantakaḥ.
मनुष्यों का अजेय शत्रु कौन है और कौन-सा रोग अंतहीन है?
भावार्थ: यक्ष मानव जीवन के सबसे खतरनाक दोषों की पहचान चाहता है।
कीदृशः सुतः साधुरसाधुः कीदृशः स्मृतः॥3॥
Kīdṛśaḥ sutaḥ sādhurasādhuḥ kīdṛśaḥ smṛtaḥ.
सज्जन और दुर्जन पुत्र कैसे माने जाते हैं?
भावार्थ: चरित्र के आधार पर ही व्यक्ति सज्जन या दुर्जन कहलाता है।
युधिष्ठिर उवाच
Yudhiṣṭhira uvāca
युधिष्ठिर ने कहा।
भावार्थ: युधिष्ठिर धर्मपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं।
क्रोधः शत्रुर्जयः शान्तिर्व्याधिरनन्तकः।
Krodhaḥ śatrurjayaḥ śāntirvyādhiranantakaḥ.
क्रोध अजेय शत्रु है और शांति अंतहीन रोग है।
भावार्थ: क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और अशांति जीवन को नष्ट करती है।
सर्वभूतहिते साधुरसाधुः स्मृतः॥4॥
Sarvabhūtahite sādhurasādhuḥ smṛtaḥ.
जो सबके हित में रहता है वही सज्जन, अन्यथा दुर्जन माना जाता है।
भावार्थ: परोपकार और करुणा ही सज्जनता की सच्ची पहचान है।
पाठसार / Moral
यह पाठ बताता है कि जीवन में माता का महत्व, मन की गति, चिंता की अतृप्ति, क्रोध और लोभ के दुष्परिणाम तथा परोपकार का मूल्य सर्वोपरि है। सच्चा सज्जन वही है जो सबके कल्याण के लिए जीता है।शब्दार्थः
| Sanskrit | Pronunciation | Hindi Meaning |
|---|---|---|
| किंस्वित् | Kiṁsvid | क्या |
| गुरुतरम् | Gurutaram | अधिक भारी |
| भूमेः | Bhūmeḥ | पृथ्वी से |
| उदरम् | Udaram | पेट |
| खादति | Khādati | खाता है |
| छिद्रम् | Chidram | छेद |
| वायोः | Vāyoḥ | वायु का |
| बहुदरम् | Bahudaram | बहुत पेट वाला |
| माता | Mātā | माँ |
| मनः | Manaḥ | मन |
| शीघ्रतरम् | Śīghrataram | बहुत तेज |
| चिन्ता | Cintā | चिंता |
| शत्रुः | Śatruḥ | शत्रु |
| व्याधिः | Vyādhiḥ | रोग |
| अनन्तकः | Anantakaḥ | अंतहीन |
| क्रोधः | Krodhaḥ | क्रोध |
| शान्तिः | Śāntiḥ | शांति |
| साधुः | Sādhuḥ | सज्जन |
| असाधुः | Asādhuḥ | दुर्जन |
| सर्वभूतहिते | Sarvabhūtahite | सबके हित में |
| पुंसाम् | Puṁsām | मनुष्यों का |
| जयः | Jayaḥ | अजेय |
| स्मृतः | Smṛtaḥ | माना गया |
| पितृवत्सला | Pitṛvatsalā | पिता-समान स्नेह |
| वातात् | Vātāt | वायु से |
अभ्यास प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1
भूमेः गुरुतरं किंस्वित् ?
Bhūmeḥ gurutaraṁ kiṁsvid?
पृथ्वी से अधिक भारी क्या है?
उत्तर:
भूमेः गुरुतरा माता।
Bhūmeḥ gurutarā mātā.
माता पृथ्वी से अधिक महान है।
प्रश्न 2
खाद् उदरं किंस्वित् ?
Khād udaraṁ kiṁsvid?
किसका पेट नहीं भरता?
उत्तर:
पिता खाद् उदरः।
Pitā khād udaraḥ.
पिता का पेट नहीं भरता।
प्रश्न 3
वायोः शीघ्रतरं किंस्वित् ?
Vāyoḥ śīghrataraṁ kiṁsvid?
वायु से तेज क्या है?
उत्तर:
वातात् शीघ्रतरं मनः।
Vātāt śīghrataraṁ manaḥ.
मन वायु से तेज है।
प्रश्न 4
तृष्णा बहुदरी किंस्वित् ?
Tṛṣṇā bahudarī kiṁsvid?
बहुत पेट वाली क्या है?
उत्तर:
तृष्णा बहुदरी चिन्ता।
Tṛṣṇā bahudarī cintā.
चिंता बहुत पेट वाली है।
प्रश्न 5
पुंसां दुर्जयः शत्रुः कः ?
Puṁsāṁ durjayaḥ śatruḥ kaḥ?
मनुष्यों का अजेय शत्रु कौन है?
उत्तर:
पुंसां दुर्जयः शत्रुः क्रोधः।
Puṁsāṁ durjayaḥ śatruḥ krodhaḥ.
क्रोध मनुष्यों का अजेय शत्रु है।
प्रश्न 6
अनन्तकः व्याधिः कः ?
Anantakaḥ vyādhiḥ kaḥ?
अंतहीन रोग कौन-सा है?
उत्तर:
अनन्तकः व्याधिः लोभः।
Anantakaḥ vyādhiḥ lobhaḥ.
लोभ अंतहीन रोग है।
प्रश्न 7
रेखाङ्कितपदानि अधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत।
Rekhāṅkitapadāni adhikṛtya praśnanirmāṇaṁ kuruta.
रेखांकित शब्दों पर प्रश्न बनाइए।
उत्तर:
(क) पिता खाद् उदरः → खाद् उदरः कः ?
(ख) निर्दयः असाधुः स्मृतः → असाधुः कीदृशः स्मृतः ?
(ग) सर्वभूतहिते साधुः स्मृतः → साधुः कीदृशः स्मृतः ? Khād udaraḥ kaḥ?
Asādhuḥ kīdṛśaḥ smṛtaḥ?
Sādhuḥ kīdṛśaḥ smṛtaḥ? पेट किसका नहीं भरता?
दुर्जन कैसा माना गया है?
सज्जन कैसा माना गया है?
(ख) निर्दयः असाधुः स्मृतः → असाधुः कीदृशः स्मृतः ?
(ग) सर्वभूतहिते साधुः स्मृतः → साधुः कीदृशः स्मृतः ? Khād udaraḥ kaḥ?
Asādhuḥ kīdṛśaḥ smṛtaḥ?
Sādhuḥ kīdṛśaḥ smṛtaḥ? पेट किसका नहीं भरता?
दुर्जन कैसा माना गया है?
सज्जन कैसा माना गया है?
पाठसार / Moral
यह पाठ जीवन के गूढ़ सत्यों को प्रश्न-उत्तर के माध्यम से स्पष्ट करता है। माता, मन, चिंता, क्रोध और लोभ के वास्तविक स्वरूप को समझाता है। जो सब प्राणियों के हित में कार्य करता है वही सच्चा सज्जन है। मनुष्य को क्रोध और लोभ से दूर रहकर सदाचार अपनाना चाहिए।Path – Yaksha Yudhishthira Samvada
भावार्थ (पंक्ति-दर-पंक्ति)
यक्ष उवाच
भावार्थ: यक्ष जीवन के गूढ़ सत्य जानने हेतु प्रश्नों की शुरुआत करता है।
किंस्विद् गुरुतरं भूमेः किंस्विद् उदरं न खादति।
भावार्थ: यक्ष पूछता है कि भौतिक जगत से बढ़कर कौन-सी मानवीय सत्ता महान है और किसकी तृष्णा कभी तृप्त नहीं होती।
किंस्विद् छिद्रं न वायोः किंस्विद् बहुदरं न गणयति॥1॥
भावार्थ: वह प्रकृति और मनुष्य की इच्छाओं की अतृप्ति पर विचार कराता है।
युधिष्ठिर उवाच
भावार्थ: युधिष्ठिर विवेक और धर्म के आधार पर उत्तर देने को प्रस्तुत होते हैं।
माता गुरुतरा भूमेः खादति पितृवत्सला।
भावार्थ: माता का त्याग, सहनशीलता और ममता पृथ्वी से भी महान है; उसका प्रेम असीम है।
मनः शीघ्रतरं वाताच्चिन्ता बहुदरी गण्यते॥2॥
भावार्थ: मन अत्यंत चंचल और तीव्र है; चिंता कभी संतुष्ट नहीं होती।
यक्ष उवाच
भावार्थ: यक्ष अब मनुष्य के आंतरिक दोषों पर प्रश्न करता है।
कः शत्रुर्जयः पुंसां कश्च व्याधिरनन्तकः।
भावार्थ: वह पूछता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु और अंतहीन रोग क्या है।
कीदृशः सुतः साधुरसाधुः कीदृशः स्मृतः॥3॥
भावार्थ: सज्जनता-दुर्जनता का माप चरित्र से होता है—यह स्पष्ट करने का आग्रह है।
युधिष्ठिर उवाच
भावार्थ: युधिष्ठिर धर्मसम्मत निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं।
क्रोधः शत्रुर्जयः शान्तिर्व्याधिरनन्तकः।
भावार्थ: क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है; लोभ/अशांति अंतहीन रोग के समान है।
सर्वभूतहिते साधुरसाधुः स्मृतः॥4॥
भावार्थ: जो सभी के हित में कार्य करे वही सज्जन है; स्वार्थी आचरण दुर्जनता है।