यह पाठ भगवद्गीता के अमृतमय उपदेशों को प्रस्तुत करता है, जिसमें ईश्वर की सर्वव्यापकता, अविनाशी आत्मा और कर्मयोग का संदेश दिया गया है। जब-जब धर्म की हानि होती है, तब ईश्वर धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेते हैं। आत्मा न कभी नष्ट होती है और न ही किसी भौतिक तत्व से प्रभावित होती है, केवल शरीर बदलता है। मनुष्य को सुख-दुःख और जय-पराजय को समान समझकर अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। फल की आसक्ति त्यागकर निष्काम कर्म करना ही जीवन का श्रेष्ठ मार्ग है।
Path – Gitavachanamritani
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त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः।
tvam | ā-di | de-vaḥ | pu-ru-ṣaḥ | pu-rā-ṇaḥ
आप आदिदेव हैं, शाश्वत और प्राचीन पुरुष हैं।
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
tvam | a-sya | vi-śva-sya | pa-ram | ni-dhā-nam
आप इस पूरे विश्व का परम आधार हैं।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम।
vet-tā | a-si | ved-yam | cha | pa-ram | cha | dhā-ma
आप जानने वाले भी हैं और जानने योग्य भी तथा परम धाम हैं।
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥1॥
tva-yā | ta-tam | vi-śvam | a-nan-ta-rū-pa
हे अनन्त रूप वाले! आपके द्वारा सारा विश्व व्याप्त है।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
ya-dā | ya-dā | hi | dhar-ma-sya | glā-niḥ | bha-va-ti | bhā-ra-ta
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥2॥
a-bhyut-thā-nam | a-dhar-ma-sya | ta-dā | āt-mā-nam | sṛ-jā-mi | a-ham
और अधर्म की वृद्धि होने पर मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
pa-ri-trā-ṇā-ya | sā-dhū-nām | vi-nā-śā-ya | cha | duṣ-kṛ-tām
साधुओं की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥3॥
dhar-ma | san-sthā-pa-na | ar-thā-ya | sam-bha-vā-mi | yu-ge | yu-ge
मैं हर युग में धर्म की स्थापना के लिए जन्म लेता हूँ।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
su-kha | duḥ-khe | sa-me | kṛ-tv-ā | lā-bhā-lā-bhau | ja-yā-ja-yau
सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान मानकर।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥4॥
ta-to | yud-dhā-ya | yu-jya-sva | nai-vam | pā-pam | a-vāp-sya-si
तब युद्ध के लिए तैयार हो जाओ, इससे पाप नहीं मिलेगा।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
vā-sān-si | jīr-ṇā-ni | ya-thā | vi-hā-ya | na-vā-ni | gṛh-ṇā-ti | na-raḥ | a-pa-rā-ṇi
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण करता है।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यानि संयाति नवानि देही ॥5॥
ta-thā | śa-rī-rā-ṇi | vi-hā-ya | jīr-ṇā-ni | a-nyā-ni | sam-yā-ti | na-vā-ni | de-hī
वैसे ही आत्मा पुराने शरीर छोड़कर नए शरीर ग्रहण करती है।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
na | e-nam | chin-dan-ti | śas-trā-ṇi | na | e-nam | da-ha-ti | pā-va-kaḥ
इस आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥6॥
na | cha | e-nam | kle-da-yan-ti | ā-paḥ | na | śo-ṣa-ya-ti | mā-ru-taḥ
न जल भिगो सकता है और न वायु सुखा सकती है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
kar-ma-ṇi | e-va | a-dhi-kā-raḥ | te | mā | pha-le-ṣu | ka-dā-cha-na
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म में है, फल में नहीं।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥7॥
mā | kar-ma | pha-la | he-tuḥ | bhūḥ | mā | te | saṅ-gaḥ | a-stu | a-kar-ma-ṇi
फल की आसक्ति मत रखो और अकर्म में भी मत उलझो।
शब्दार्थ
| Sanskrit | Pronunciation | Hindi Meaning |
|---|---|---|
| आदिदेवः | ā-di-de-vaḥ | प्रथम देव |
| पुराणः | pu-rā-ṇaḥ | शाश्वत |
| निधानम् | ni-dhā-nam | आधार |
| वेत्ता | vet-tā | जानकार |
| वेद्यम् | ved-yam | जानने योग्य |
| ग्लानिः | glā-niḥ | हानि |
| अभ्युत्थानम् | a-bhyut-thā-nam | वृद्धि |
| आत्मानम् | āt-mā-nam | स्वयं को |
| सृजामि | sṛ-jā-mi | प्रकट करता हूँ |
| परित्राणाय | pa-ri-trā-ṇā-ya | रक्षा हेतु |
| दुष्कृताम् | duṣ-kṛ-tām | पापी |
| संस्थापनार्थाय | san-sthā-pa-na-ar-thā-ya | स्थापना हेतु |
| सम्भवामि | sam-bha-vā-mi | जन्म लेता हूँ |
| युज्यस्व | yu-jya-sva | तैयार हो |
| वासांसि | vā-sān-si | वस्त्र |
| जीर्णानि | jīr-ṇā-ni | पुराने |
| देही | de-hī | आत्मा |
| शस्त्राणि | śas-trā-ṇi | हथियार |
| पावकः | pā-va-kaḥ | अग्नि |
| आपः | ā-paḥ | जल |
| मारुतः | mā-ru-taḥ | वायु |
| अधिकारः | a-dhi-kā-raḥ | अधिकार |
| सङ्गः | saṅ-gaḥ | आसक्ति |
| अकर्मणि | a-kar-ma-ṇi | निष्क्रियता |
| अवाप्स्यसि | a-vāp-sya-si | प्राप्त करोगे |
अन्वयः
हे अनन्तरूप! त्वं आदिदेवः, पुराणः पुरुषः (असि)।
he a-nan-ta-rū-pa | tvam ā-di-de-vaḥ | pu-rā-ṇaḥ | pu-ru-ṣaḥ (a-si)
हे अनन्त रूप वाले! आप आदिदेव, शाश्वत और प्राचीन पुरुष हैं।
त्वम् अस्य विश्वस्य परं निधानम् (असि)।
tvam a-sya vi-śva-sya | pa-ram ni-dhā-nam (a-si)
आप इस समस्त विश्व के परम आधार हैं।
त्वं वेत्ता वेद्यं च (असि)।
tvam vet-tā | ved-yam cha (a-si)
आप जानने वाले भी हैं और जानने योग्य भी हैं।
त्वं परं धाम (असि)।
tvam pa-ram dhā-ma (a-si)
आप ही परम धाम हैं।
(हे अनन्तरूप!) त्वया विश्वं च ततम्।
(he a-nan-ta-rū-pa) | tva-yā vi-śvam cha ta-tam
हे अनन्त रूप वाले! आपके द्वारा सारा विश्व व्याप्त है।
हे भारत! यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः (भवति),
he bhā-ra-ta | ya-dā ya-dā hi | dhar-ma-sya glā-niḥ (bha-va-ti)
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है,
अधर्मस्य अभ्युत्थानं भवति तदा अहं आत्मानं सृजामि।
a-dhar-ma-sya a-bhyut-thā-nam bha-va-ti | ta-dā a-ham āt-mā-nam sṛ-jā-mi
और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
(अहं) युगे युगे साधूनां परित्राणाय,
(a-ham) yu-ge yu-ge | sā-dhū-nām pa-ri-trā-ṇā-ya
मैं हर युग में साधुओं की रक्षा के लिए,
दुष्कृतां विनाशाय,
duṣ-kṛ-tām vi-nā-śā-ya
दुष्टों के विनाश के लिए,
धर्मसंस्थापनार्थाय च सम्भवामि।
dhar-ma san-sthā-pa-na ar-thā-ya cha sam-bha-vā-mi
और धर्म की स्थापना के लिए जन्म लेता हूँ।
लाभालाभौ, जयाजयौ, सुखदुःखे समे कृत्वा
lā-bhā-lā-bhau | ja-yā-ja-yau | su-kha duḥ-khe sa-me kṛ-tv-ā
लाभ-हानि, जय-पराजय तथा सुख-दुःख को समान मानकर
ततः युद्धाय युज्यस्व।
ta-taḥ yud-dhā-ya yu-jya-sva
तब युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।
एवं पापं न अवाप्स्यसि।
e-vam pā-pam na a-vāp-sya-si
इस प्रकार तुम्हें पाप प्राप्त नहीं होगा।
यथा नरः जीर्णानि वासांसि विहाय अपराणि नवानि (वासांसि) गृह्णाति,
ya-thā na-raḥ | jīr-ṇā-ni vā-sān-si vi-hā-ya | a-pa-rā-ṇi na-vā-ni (vā-sān-si) gṛh-ṇā-ti
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण करता है,
तथा देही जीर्णानि शरीराणि विहाय नवानि (शरीराणि) संयाति।
ta-thā de-hī | jīr-ṇā-ni śa-rī-rā-ṇi vi-hā-ya | na-vā-ni (śa-rī-rā-ṇi) sam-yā-ti
वैसे ही आत्मा पुराने शरीर छोड़कर नए शरीर प्राप्त करती है।
शस्त्राणि एनं न छिन्दन्ति,
śas-trā-ṇi e-nam na chin-dan-ti
शस्त्र इस आत्मा को काट नहीं सकते,
पावकः एनं न दहति,
pā-va-kaḥ e-nam na da-ha-ti
अग्नि इसे जला नहीं सकती,
आपः एनं न क्लेदयन्ति,
ā-paḥ e-nam na kle-da-yan-ti
जल इसे भिगो नहीं सकता,
मारुतः एनं न शोषयति।
mā-ru-taḥ e-nam na śo-ṣa-ya-ti
और वायु इसे सुखा नहीं सकती।
कर्मणि एव ते अधिकारः, फलेषु कदाचन मा।
kar-ma-ṇi e-va te a-dhi-kā-raḥ | pha-le-ṣu ka-dā-cha-na mā
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म में है, फल में कभी नहीं।
त्वं कर्मफलहेतुः मा भूः।
tvam kar-ma pha-la he-tuḥ mā bhūḥ
कर्म के फल का कारण बनने की इच्छा मत रखो।
अकर्मणि ते सङ्गः अपि मा अस्तु।
a-kar-ma-ṇi te saṅ-gaḥ a-pi mā a-stu
और अकर्म (कर्तव्य से पलायन) में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।
अभ्यास
1. उच्चारणं कृत्वा पुस्तिकायां च लिखत –
पुरुषः, वेत्तासि, विश्वमनन्तरूप, सङ्गोऽस्त्वकर्मणि, अभ्युत्थानमधर्मस्य, सृजाम्यहम्, धर्मसंस्थापनार्थाय, कर्मफलहेतुर्भूः
pu-ru-ṣaḥ, vet-tā-si, vi-śva-man-an-ta-rū-pa, saṅ-go’stu a-kar-ma-ṇi, a-bhyut-thā-nam a-dhar-ma-sya, sṛ-jā-mi a-ham, dhar-ma-san-sthā-pa-na-ar-thā-ya, kar-ma-pha-la-he-tu-bhūḥ
इन शब्दों का सही उच्चारण करके कॉपी में लिखो।
2. एकपदेन उत्तरत –
(क) पुराणः पुरुषः कः ?
(ka) pu-rā-ṇaḥ pu-ru-ṣaḥ kaḥ
प्राचीन पुरुष कौन है?
उत्तर:
ईश्वरः।
ī-śva-raḥ
ईश्वर।
(ख) अस्माकं कुत्र अधिकारः अस्ति ?
(kha) a-smā-kam ku-tra a-dhi-kā-raḥ a-sti
हमारा अधिकार कहाँ है?
उत्तर:
कर्मणि।
kar-ma-ṇi
कर्म में।
(ग) केषां परित्राणाय ईश्वरः सम्भवति ?
(ga) ke-ṣām pa-ri-trā-ṇā-ya ī-śva-raḥ sam-bha-va-ti
ईश्वर किनकी रक्षा के लिए जन्म लेते हैं?
उत्तर:
साधूनाम्।
sā-dhū-nām
साधुओं की।
(घ) शस्त्राणि कं न छिन्दन्ति ?
(gha) śas-trā-ṇi kam na chin-dan-ti
शस्त्र किसे नहीं काट सकते?
उत्तर:
आत्मानम्।
āt-mā-nam
आत्मा को।
3. पूर्णवाक्येन उत्तरत –
(क) परमात्मा आत्मानं कदा सृजति ?
(ka) pa-ra-māt-mā āt-mā-nam ka-dā sṛ-ja-ti
परमात्मा स्वयं को कब प्रकट करते हैं?
उत्तर:
यदा धर्मस्य ग्लानिः भवति तदा आत्मानं सृजति।
ya-dā dhar-ma-sya glā-niḥ bha-va-ti ta-dā āt-mā-nam sṛ-ja-ti
जब धर्म की हानि होती है तब परमात्मा प्रकट होते हैं।
(ख) कं आपः न क्लेदयन्ति ?
(kha) kam ā-paḥ na kle-da-yan-ti
जल किसे नहीं भिगोता?
उत्तर:
आत्मानम्।
āt-mā-nam
आत्मा को।
(ग) जीर्णानि शरीराणि विहाय कः संयाति ?
(ga) jīr-ṇā-ni śa-rī-rā-ṇi vi-hā-ya kaḥ sam-yā-ti
पुराने शरीर छोड़कर कौन जाता है?
उत्तर:
देही संयाति।
de-hī sam-yā-ti
आत्मा जाती है।
(घ) पावकः कं न दहति ?
(gha) pā-va-kaḥ kam na da-ha-ti
अग्नि किसे नहीं जलाती?
उत्तर:
आत्मानम्।
āt-mā-nam
आत्मा को।
4. सन्धि-विच्छेदः –
उत्तर:
नरः + अपराणि = नरोऽपराणि — विसर्गसन्धिः
na-raḥ + a-pa-rā-ṇi = na-ro’pa-rā-ṇi
विसर्ग सन्धि
उत्तर:
वेत्ता + असि = वेत्तासि — सवर्णदीर्घ सन्धिः
vet-tā + a-si = vet-tā-si
सवर्ण दीर्घ सन्धि
उत्तर:
कर्मणि + एव = कर्मण्येव — यण् सन्धिः
kar-ma-ṇi + e-va = kar-ma-ṇye-va
यण् सन्धि
उत्तर:
ग्लानिः + भवति = ग्लानिर्भवति — विसर्ग सन्धिः
glā-niḥ + bha-va-ti = glā-nir-bha-va-ti
विसर्ग सन्धि
उत्तर:
सृजामि + अहम् = सृजाम्यहम् — यण् सन्धिः
sṛ-jā-mi + a-ham = sṛ-jām-ya-ham
यण् सन्धि
5. शब्द–विभक्ति–वचनम्
साधूनाम् — साधु, षष्ठी, बहुवचनम्
धर्मस्य — धर्म, षष्ठी, एकवचनम्
फलेषु — फल, सप्तमी, बहुवचनम्
आत्मानम् — आत्मन्, द्वितीया, एकवचनम्
शरीराणि — शरीर, प्रथमा, बहुवचनम्
6. विशेषण–विशेष्य योगः
पुरुषः — परः
शरीराणि — पुराणि
निधानम् — जीर्णम्
7. संस्कृत अनुवादः
(क) आपः एनं न क्लेदयन्ति।
ā-paḥ e-nam na kle-da-yan-ti
जल इसको गीला नहीं करता।
(ख) धर्मसंस्थापनार्थाय अहं सम्भवामि।
dhar-ma-san-sthā-pa-na-ar-thā-ya a-ham sam-bha-vā-mi
धर्म की स्थापना के लिए मैं जन्म लेता हूँ।
(ग) सुखदुःखे समे कृत्वा युद्धाय युज्यस्व।
su-kha duḥ-khe sa-me kṛ-tv-ā yud-dhā-ya yu-jya-sva
सुख-दुःख को समान मानकर युद्ध के लिए तैयार हो।
शिक्षण-सङ्केतः
सर्वेषां श्लोकानां सस्वरवाचनं कार्यत।
sar-ve-ṣām ślo-kā-nām sa-sva-ra-vā-ca-nam kā-rya-tam
सभी श्लोकों का सही स्वर के साथ पाठ कराया जाए।
कृष्णार्जुनसंवादस्य प्रसङ्गः संक्षेपेण श्राव्यत।
kṛṣ-ṇār-ju-na-san-vā-da-sya pra-saṅ-gaḥ san-kṣe-pe-ṇa śrā-vya-tām
कृष्ण-अर्जुन संवाद का प्रसंग संक्षेप में सुनाया जाए।
प्रत्येक श्लोक का नैतिक संदेश (Moral)
श्लोक 1
śloka eka
ईश्वर ही सृष्टि का मूल आधार हैं। सम्पूर्ण संसार उन्हीं में स्थित है और वही सर्वोच्च सत्य हैं।
श्लोक 2
śloka dvi
जब-जब धर्म की हानि होती है, तब ईश्वर स्वयं अवतार लेकर संसार में संतुलन स्थापित करते हैं।
श्लोक 3
śloka tri
ईश्वर का अवतार साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए होता है।
श्लोक 4
śloka catvāri
मनुष्य को सुख-दुःख और जय-पराजय को समान मानकर कर्तव्य करना चाहिए, तभी वह पाप से बच सकता है।
श्लोक 5
śloka pañca
आत्मा अमर है, केवल शरीर बदलता है। मृत्यु शरीर की होती है, आत्मा की नहीं।
श्लोक 6
śloka ṣaṭ
आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है; वह अविनाशी और अजर-अमर है।
श्लोक 7
śloka sapta
मनुष्य को फल की इच्छा छो़ड़कर केवल कर्म करना चाहिए और अकर्म (कर्तव्य से पलायन) से दूर रहना चाहिए।