Lesson: 15 – Neetishlokah

इन नीतिश्लोकों में सिखाया गया है कि हम अपने सद्गुणों से बुराइयों को जीतें, धैर्य के साथ परिश्रम करें, विवेकपूर्वक जीवन जिएँ, लोभ-आलस्य-भय त्यागें और हर परिस्थिति में न्याय के मार्ग पर डटे रहें।

पञ्चदशः पाठः — नीतिश्लोकाः

पाठ्यांशः (Shlokas with Pronunciation & Meaning)

अक्रोधेन जयेৎ क्रोधम् असाधुं साधुना जयेते। (akrodhena jayet krodham asādhuṃ sādhunā jayeta) क्रोध को अक्रोध से, असाधु व्यक्ति को सद्गुणों से जीतना चाहिए।
जयेৎ कदार्यं दानेन जयेৎ स्वेन चातुर्यम् ॥१॥ (jayet kadāryaṃ dānena jayet svena cāturyam) कंजूसी को दान से और चालाकी / कपट को अपने अच्छे आचरण से जीतो।
गच्छन् पिप्पिलिको याति योजनानां शतान्यपि। (gacchan pippiliko yāti yojanānāṃ śatāny api) चलती हुई चींटी भी निरन्तर प्रयास से सैकड़ों योजन की दूरी तय कर लेती है।
आच्छन्नं वैनतेयेन पदं केन न गच्छति ॥२॥ (ācchannaṃ vainateyena padaṃ kena na gacchati) परन्तु शक्तिशाली गरुड़ यदि आँखें ढँक ले, तो एक कदम भी नहीं चल पाता।
दिनान्ते च विवेकेन निशान्ते च विवेत्तु पथः। (dinānte ca vivekena niśānte ca vivettu pathaḥ) दिन के अन्त में बुद्धि से किए कार्यों पर, और रात के अन्त में आगे के मार्ग पर विचार करना चाहिए।
भोजनान्ते विवेक्तव्यं तत्त्किं वैद्यस्य प्रयोजनम् ॥३॥ (bhojanānte vivektavyaṃ tat kiṃ vaidyasya prayojanam) भोजन के बाद भी विवेक से आचार रखें; यदि स्वास्थ्य न संभालें तो वैद्य (डाक्टर) की क्या उपयोगिता?
बहुवित्तार्थं पुरूषेण हन्तव्या भूमिरिच्छता। (bahu-vittārthaṃ puruṣeṇa hantavyā bhūmir icchatā) जो व्यक्ति भूमि या धन की इच्छा से दूसरों को हानि पहुँचाता है, वह अधर्म करता है।
त्याज्यं तस्य आलस्यं भयम् अधर्मश्च सर्वथा ॥४॥ (tyājyaṃ tasya ālasyaṃ bhayam adharmaś ca sarvathā) ऐसे व्यक्ति को आलस्य, भय और अधर्म को सर्वथा त्याग देना चाहिए।
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु (nindantu nīti-nipuṇā yadi vā stuvantu) नीति में कुशल लोग निन्दा करें या प्रशंसा करें,
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्। (lakṣmīḥ samāviśatu gacchatu vā yatheṣṭam) लक्ष्मी (धन) आए या चली जाए — जैसा भी हो।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा (adyaiva vā maraṇam astu yugāntare vā) मृत्यु आज ही हो या युगों के बाद हो,
न्यायपथात् प्रविचलन्ति पदं न धीराः ॥५॥ (nyāya-pathāt pravicalanti padaṃ na dhīrāḥ) धीर पुरुष न्याय के मार्ग से कभी भी एक कदम भी नहीं डिगते।

शब्दावली (Vocabulary – 25+ Words)

संस्कृत उच्चारण (Pron.) हिन्दी अर्थ
अक्रोधेनakrodhenaक्रोध रहित होकर
क्रोधम्krodhamक्रोध, गुस्सा
असाधुःasādhuḥदुष्ट व्यक्ति
साधुनाsādhunāसद्गुण से, सज्जनता से
कदार्यम्kadāryamकंजूसी, कृपणता
दानेनdānenaदान से
अनृतम्anṛtamझूठ
सत्येनsatyenaसत्य के द्वारा
पिप्पिलिकःpippilikaḥचींटी
योजनानाम्yojanānāmयोजन नामक दूरी के
शतानिśatāniसैकड़ों
वैनतेयःvainateyaḥगरुड़ (विनता का पुत्र)
दिनान्तेdinānteदिन के अंत में
निशान्तेniśānteरात के अंत में
पथःpathaḥमार्ग, रास्ता
भोजनान्तेbhojanānteभोजन के बाद
विवेकःvivekaḥविवेक, समझदारी
निन्दन्तुnindantuनिन्दा करें
नीतिनिपुणाःnīti-nipuṇāḥनीति-कुशल लोग
स्तुवन्तुstuvantuस्तुति करें, प्रशंसा करें
लक्ष्मीःlakṣmīḥधन, समृद्धि
यथेष्टम्yatheṣṭamइच्छानुसार
अद्यैवadyaivaआज ही
युगान्तरेyugāntareयुगों के बाद
न्यायपथःnyāya-pathaḥन्याय का मार्ग
धीराḥdhīrāḥधैर्यवान लोग

अभ्यासः – समाधान (Exercises with Answers)

६. पाठात् वाक्यानि पूरयत

गच्छन् पिप्पिलिको याति योजनानां शतान्यपि।
गच्छन् पिप्पिलिको योजनानां शतान्यपि याति। (gacchan pippiliko yojanānāṃ śatāny api yāti) चलती हुई चींटी भी सैकड़ों योजन की दूरी तय कर लेती है।
निन्दन्तु नीतिनिपुणाः यदि वा स्तुवन्तु …
निन्दन्तु नीतिनिपुणाः यदि वा स्तुवन्तु, धीराः न न्यायपथात् प्रविचलन्ति। (nindantu nīti-nipuṇāḥ yadi vā stuvantu, dhīrāḥ na nyāya-pathāt pravicalanti) नीति-कुशल लोग निन्दा करें या प्रशंसा, धीर पुरुष न्याय के मार्ग से नहीं डिगते।

७. विलोम-पदानि लिखत

साधु — ?
असाधुः (asādhuḥ) दुष्ट, बुरा व्यक्ति
सत्यं — ?
असत्यम् / अनृतम् (asatyam / anṛtam) असत्य, झूठ
भयम् — ?
अभयम् (abhayam) निर्भयता, निडर अवस्था
दिनान्ते — ?
निशान्ते (niśānte) रात के अंत में

नीतिः – प्रत्येक श्लोक का सन्देश (Moral of Each Verse)

१. क्रोधम् अक्रोधेन, असाधुं साधुना, कदर्यं दानेन, अनृतं सत्येन जयेत्। (krodham akrodhena, asādhuṃ sādhunā, kadaryaṃ dānena, anṛtaṃ satyena jayet) सच्ची विजय यह है कि हम क्रोध, दुष्टता, कंजूसी और झूठ को अपने सद्गुणों से जीत लें।
२. मन्दगतिरपि नित्यपरिश्रमेण दीर्घं मार्गं गच्छति, केवलं शक्तिरेव पर्याप्ता न भवति। (mandagatir api nitya-pariśrameṇa dīrghaṃ mārgaṃ gacchati, kevalaṃ śaktir eva paryāptā na bhavati) धीमी गति वाला भी निरन्तर परिश्रम से दूर तक पहुँचता है; केवल शक्ति पर घमण्ड करने से सफलता नहीं मिलती।
३. कालस्य, मार्गस्य, भोजनस्य च विवेकपूर्वकं निरीक्षणं स्वास्थ्यम् व जीवनं रक्षति। (kālasya, mārgasya, bhojanasya ca viveka-pūrvakaṃ nirīkṣaṇaṃ svāsthyaṃ ca jīvanaṃ rakṣati) समय, जीवन-मार्ग और भोजन पर विवेक के साथ सोचने से स्वास्थ्य और जीवन दोनों सुरक्षित रहते हैं।
४. भूमेः लाभार्थं परान् हिंसयन् पुरुषः पापं प्राप्नोति; लोभः, आलस्यं, भयश्च त्याज्याः। (bhūmeḥ lābhārthaṃ parān hiṃsayan puruṣaḥ pāpaṃ prāpnoti; lobhaḥ, ālasyaṃ, bhayaś ca tyājyāḥ) भूमि या धन के लिए दूसरों को कष्ट देना पाप है; लोभ, आलस्य और भय को त्यागना चाहिए।
५. निन्दायां स्तुतौ वा स्थितेऽपि, लक्ष्म्याः आगमे वा गमे, धीराः न्यायमार्गात् कदापि न चलन्ति। (nindāyāṃ stutau vā sthite’pi, lakṣmyā āgame vā game, dhīrāḥ nyāya-mārgāt kadāpi na calanti) चाहे निन्दा मिले या प्रशंसा, धन आये या जाये – धैर्यवान व्यक्ति न्याय के मार्ग से कभी नहीं हटता।

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